Saturday, 27 March 2021

मै कृतज्ञ हूं हे परमेश्वर

 

रुके-रुके से थके-थके से
कदम जोश से बढ़ेंगे फिर से
कई विघ्न के शिला पड़े थे
समस्त तन-मन हंसेंगे फिर से.....
तड़प-तड़प कर सहम-सहम कर
रात-दिन यूं ही कट रहे थे
उम्मीद आश की लिये पड़े थे
वासंती पुष्पें खिलेंगे फिर से.....
इंद्रधनुष की बहुरंगों सी
विचरते चित्त में भाव कई सी
द्वन्द के साये में जी रहे थे
सुनहरे पल-क्षण मिलेंगे फिर से.....
मैं कृतज्ञ हूं हे परमेश्वर
धन्यवाद करती हूं ईश्वर
अंधकार पथ में बिखरे थे
छंद आनंद के लिखेंगे फिर से.....
भारती दास ✍️



 

Sunday, 7 March 2021

मैं धीर सुता मैं नारी हूँ

 


सलिल कण के जैसी हूँ मैं
कभी कहीं भी मिल जाती हूँ
रीत कोई हो या कोई रस्में
आसानी से ढल जाती हूँ।
व्योम के जैसे हूँ विशाल भी
और लघु रूप आकार हूँ मैं
वेश कोई भी धारण कर लूँ
स्नेह करूण अवतार हूँ मैं।
अस्थि माँस का मैं भी पुतला
तप्त रक्त की धार हूँ मैं
बेरहमी से ऐसे कुचलते
जैसे नरभक्षी आहार हूँ मैं।
अर्द्ध वसन में लिपटी तन ये
ढोती मजदूरी का भार हूँ मैं
क्षुधा मिटाने के खातिर ही
जाती किसी के द्वार हूँ मैं।
मैं धीर सुता मैं नारी हूँ
सृष्टि का श्रृँगार हूँ मैं
हर रुपों में जूझती रहती
राग विविध झंकार हूँ मैं।
भारती दास ✍️



 

 

 

Tuesday, 23 February 2021

विभा वसंत की छायी भू पर

 

विभा वसंत की छायी भू पर
कण-कण में मद प्यार भरा है
आलिंगन में भरने को आतुर
गगन भी बांहें पसार खड़ा है.
दमक रहा है इन्दु-आनन
सिमट-सिमट तन लजा रहा है
अलसायी अलकों में जैसे
उन्माद प्रेम का सजा रहा है.
पवन तोड़ कर बंधन सारा
मुख कलियों का चूम रहा है
कौन हीन है कौन श्रेष्ठ है
संग सभी के झूम रहा है.
भवन-भवन में मगन-मगन में
मदमस्त होकर घूम रहा है
भूमि-अंबर के ओर-छोर में
विचर कहीं भी खूब रहा है.
इच्छाओं का चंचल सिंधु
मन-तरंग में डूब रहा है
विवश-विकल-विविध पीड़ा से
सुख वसंत भी जूझ रहा है.
सुने यही थे कभी पढे थे
अनंग-रुप अवतार रहा है
क्यों कुसुमाकर बेबस होकर
सौम्य-रुप नकार रहा है.
भारती दास ✍️








 



Sunday, 14 February 2021

जय भगवती भारती

 

जय भगवती भारती
जगतवंदिनी पीड़ा हरती
पद्मवासिनी विद्या देती
मां सकल विश्व तारती
जय भगवती भारती....
रुप मनोहर अतिशय सुंदर
शुभता भर दे उर के अंदर
मां श्वेत वस्त्र धारती

जय भगवती भारती....
कर में वीणा राग सुना दे
ब्रह्माप्रिया अनुराग सिखा दे
मां करते हम आरती
जय भगवती भारती....

भारती दास ✍️


 

 

Tuesday, 2 February 2021

प्रकृति का मंगल वरदान


 

बीती रजनी दिनकर जागा
हंसती आई स्वर्णिम आभा
मंद पवन बहता मादक सा
भीनी-भीनी सुगंध सुमन का.
विटप पत्र से छनकर आती
माघ की मीठी धूप सुहाती
सौंदर्य सुधा से सुरभित धरती
सविता देव की मृदु अनुभूति.
व्याकुलता तृष्णा के मारे
देख न पाते नयन हमारे
मादक मोहक चारो ओर
बिखरा है आनंद विभोर.
अन्न जल वसुधा ही देती
रत्नगर्भा कहाती धरती
धरणी के दो हाथे बनकर
श्रम करते उत्साह से भरकर.
हरी-भरी फसलें इठलाती
लह-लह कर ये खेतें हंसती
है प्रकृति का मंगल वरदान
कण-कण में फैला अनुदान.
भारती दास ✍️

 

Sunday, 24 January 2021

हम भारत पुत्र महान हैं

 

हम भारत पुत्र महान हैं
युगों-युगों से जहां पर बहती
पावन गंगा धाम है,
हम भारत पुत्र महान हैं....
अन्नपूर्णा है धरती सारी
रुप विधाता किसान हैं,
हम भारत पुत्र महान हैं....
साहस शौर्य दिखाते सैनिक
रक्त बहाते जवान हैं,
हम भारत पुत्र महान हैं...
जिन गाथा में पूर्वज बसते
सत्य स्वरूप भगवान हैं,
हम भारत पुत्र महान हैं....
हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई
धर्म सभी के समान हैं,
हम भारत पुत्र महान हैं....
भारती दास ✍️



 

 

Friday, 15 January 2021

चांद के घर में बैठे सुख से

 



जीवन के निरंतरता में
याद नदी सी बहती रहेगी
दूर हुये क्यों सबसे बिछड़कर
मां की ममता बिलखती रहेगी.
चोट मिली है सारी उमर की
कातर करूणा सिसकती रहेगी
कौन समझता दर्द किसी का 
वहशी ये दुनिया हंसती रहेगी.
चांद के घर में बैठे सुख से
विकल सी आंखें झड़ती रहेगी
प्रारब्ध बड़ा है जीवन छोटा
मौन व्यथा ये कहती रहेगी.
सूने-सूने से वृन्तों पर
पुष्प कली फिर खिलती रहेगी
अर्पित है भावों के गूंचे
स्नेह की लौ जलती ही रहेगी.
भारती दास ✍️
भाईजी की छठी पुण्य तिथि पर श्रद्धांजलि 

 

Monday, 4 January 2021

हे नवल वर्ष सुस्वागत है

 

हे नवल वर्ष सुस्वागत है
कैसे कहूं अनुरागी इस मन में
कुछ अनकही सी चाहत है
हे नवल वर्ष सुस्वागत है....
स्वप्न कई ये नयन बुने थे
अनसुलझी धागों को चुने थे
उन ख़्वाबों में मृदु रंग भरने
स्नेहिल संग की चाहत है
हे नवल वर्ष सुस्वागत है....
महसूस अगर हो पर की पीड़ा
बरसेंगे दृग कोर की घेरा
सुखद सुनहरा दिन हो प्यारा
सुख रजनी की चाहत है
हे नवल वर्ष सुस्वागत है....
श्रम योगी बनकर मुस्काये
कर्म की पूजा दिल में समाये
संकल्प अधूरे हो सब पूरे
सहयोग सकल की चाहत है
हे नवल वर्ष सुस्वागत है....

भारती दास ✍️ 

 

Tuesday, 29 December 2020

जा रहा है वर्ष ये बीस



बेरोजगार निष्काम बनाया
प्राणहीन निष्प्राण बनाया
खूब रुलाया खूब सताया
घर-घर में संकट ही लाया
देकर ढेरों ही दुख टीस
जा रहा है वर्ष ये बीस....
कुछ शर्म है कुछ ग्लानि है
जितने दिये लाभ हानि है
मनमर्जी कुछ मनमानी है
लापरवाही कई, शैतानी है
झुकाकर अपना ही शीश
जा रहा है वर्ष ये बीस....
फिर उम्मीद की बंधेगी डोर
फिर से होगी मोहक भोर
मंदिर में घंटे की शोर
होठों पर स्मित विभोर
होगी फिर खुशियों की जीत....
जा रहा है वर्ष ये बीस....
प्रीती-नीति का भाव विधान
मस्जिद में आयत की तान
स्वजन नेह का मान गुमान
फिर से हंसेगा हिंदुस्तान
विहग मधुर गायेगी गीत
जा रहा है वर्ष ये बीस....
भारती दास ✍️









Thursday, 24 December 2020

कर्म ही जीवन गति हो

 

प्रतिशोध जिसके मन भरा
उसका कहां होता भला
अवसाद में पल-पल गला
कब चैन उसको है मिला.
भीष्म जिनके शौर्य की
गाथा सुनाती है मही
अर्जुन की ख्याति क्षेत्र की
गुंजित पताका भी ढही.
रक्त से धोयी गयी थी
द्रोपदी के केश को
भेंट रण की चढ गये थे
बैर ईर्ष्या द्वेष वो.
ना जोश था ना हर्ष था
नरमुंड का अवशेष था
उस जीत के आगोश में
इक क्षोभ केवल शेष था.
मन पर नही तन पर भी शांति
सुख की वृष्टि करती है
सौम्य स्नेह की रश्मि से
संताप मति का हरती है.
प्रभु ने दिये हैं सुख सभी
अन्न नीर धरती पर यहीं
अंत होता है नहीं कभी
लोभ लालच का कहीं.
तप त्याग ऐसी शक्ति है
जिसको सदा जग मानता
आत्मबल से जूझकर भी
जो कभी ना हारता.
स्वाभिमान से बढते चले
अभिमान ना ही दंभ हो
कर्म ही जीवन गति हो
यही ध्येय हो यही मंत्र हो.