नीले रंग को ओढ़कर रहता
काली-भूरी चोंच में सजता
पेट का रंग होता बादामी
दुम के नीचे रंग आसमानी।
इन रंगों में छटा बिखेरता
अद्भुत रूप में वह निखरता
शिव का प्रतीक मंगल का सूचक
नीलकंठ अब हुआ है दुर्लभ।
विजया दशमी पर दर्शन करते हैं
लोग भविष्य का आकलन करते हैं
सघन-तरल का मंथन करते हैं
हो बरस मनोरम चिंतन करते हैं।
कर्कश स्वर में बोलता रहता
शुभता का वर देकर जाता
नीलकंठ खग शिवमय होता
लोक संस्कृति में सब यह कहता।
" नीलकंठ कीड़ा भक्षे,मुख में विराजे राम
करनी वाको कुछ रहे,दर्शन से मोहि काम "
श्रद्धा के कई रुप है,जिसका करते अभिनंदन
सुख-दुःख से मिलकर ही,चलता है यह जीवन।
भारती दास ✍️
विजया दशमी की हार्दिक शुभकामनाएँ
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