Monday, 25 July 2016

धीर-वीर तुम सैनिकों



विपत्तिग्रस्त ये देश हमारा  
करता है नमन सदा तुम्हारा 
निडर धीर-वीर सैनिक तुमसे 
है सुरक्षित देश ये प्यारा।
भयभीत-डरावना सा कल का
गुजरा वो पलछिन रहा 
आतंकी-उग्रवाद हमेशा
क्षण-क्षण करता छल रहा।
गोली के उन बौछारों से 
तुमने अपने जान दिये  
जब भी कोई संकट आता
तुम ही तो रक्षक बन गये।
अशक्त-वक्त की विकट राह में
राजनीती बन गयी कुरीति
घृणा-द्वेष ने जड़ को जमाया
रही ना अब वो पावन-प्रीति।
प्राण-प्रण से जूझते रहते 
हँसते ही प्राण निकल जाता 
ना उर में भय ना पांव में बेड़ी
जब तक ना धड़कन थम जाता।
भारती दास ✍️ 



Thursday, 14 July 2016

हे मेघदूत तुम आये



हे मेघदूत तुम आये
सन्देश प्रीत का लाये
बरसा के नभ से सोना
दारिद्रय तुम मिटाये, हे....
प्यासी पड़ी थी धरती
मुश्किल में जान अटकी
जीवों में प्राण देकर
आनंद सुधा बहाये, हे....
कुसुमित हुई लतायें
हर्षित हुई फिजायें
मन बन गया है उपवन
उर में सुमन खिलाये, हे....
बिजली चमकती जाये
दादुर के सुर सुहाये
रिम झिम के स्वर निरंतर
नई कोई राग गाये, हे....      
                 

Friday, 1 July 2016

भावों की भव्यता



भावों की भव्यता में ही
काव्य की धारायें बहती 
सौन्दर्य की सुरम्यता में ही
रूपों के माधुर्य निखरती.
कविता एक प्रवाह है
भावों की अभिव्यक्ति है
मन के तार से झंकृत होकर
कथ्य कई कह देती है.
शब्द-निशब्द जब हो जाते हैं
भाव ह्रदय के बहते हैं
हर्ष-विषाद के अभिनव रूप
मधुमय गान बनाते हैं.
कभी हताशा कभी निराशा
जब भी शोर मचाते हैं
नैनों से मोती निकलकर
काव्य की माला पिरोते हैं.
किसी समय की सुखद स्मृति
अतुलनीय सुख पहुंचाते हैं
हरे भरे नव पल्लव सा मन
पुष्पित तरु बन जाते हैं.
भाषा की परिशुद्धता
कविता में नहीं होता
भावों का स्वर लय बन कर
छंद-बद्ध बन जाता.
है यही अभिलाषा मन की
सारी पीड़ा दुःख-सुख रख दूँ
भावनाओं का दीप जलाकर
परमात्मा के सम्मुख रख दूँ.