Thursday, 24 September 2026

समय को उपेक्षा पसंद नहीं होता


भारत की पुरातन गरिमा से एक ही तथ्य उजागर होता है कि साधु-संत,ब्राह्मणों और पुरोहितों का वर्ग न्यूनतम निर्वाह में अपना काम चलाते रहे तथा शेष समय में लोकमंगल की सामयिक आवश्यकताओं को पूरा करने में लगे रहे।उनकी सेवा साधना ने जन-जन का मन जीतने में कामयाब रहा, इसीलिए लोगों ने उनकी परामर्श को अपने जीवन में उतारने को अपना ध्येय समझा और सर्वतोमुखी प्रगति का वातावरण बनते गया।

              उपनिषद कहता है कि क्षण में शाश्वत छिपा है और अनु में विराट समाया है, जो क्षण को पहचान लेता है वही सत्य को जान पाता है जिसने भी क्षण को तिरस्कार किया उसने विराट की व्यापकता को ही खो दिया।

जीवन का प्रत्येक क्षण महत्वपूर्ण है। किसी भी क्षण का मूल्य किसी दूसरे क्षण से न तो ज्यादा है और न ही कम।इस बात को वो जानते हैं जो प्रत्येक क्षण को आनंदमय बना लेते हैं। अच्छे समय की प्रतीक्षा करना व्यर्थ है।

               संसार में सफल वही है जिसे समय का सदुपयोग करना आता है। जब हम समय से अपने कार्यों को पूरा करते हैं तब कार्यों में होने वाले सफलता के बारे में सोचते हैं तो मन को भी संतुष्टि मिलती है। हमारी कार्यकुशलता, बौद्धिक क्षमता और भावनात्मक क्षमता का भी जीवन में मह्त्त्वपूर्ण भूमिका है। किसी कार्य को करने में कितना समय लगता है इसकी भी समझ विकसित होती है।कभी-कभी नासमझी के कारण अधिक समय लग जाता है।

        समय ही जीवन की परिभाषा है क्योंकि समय से ही जीवन बनता है। अतःसमय का सदुपयोग करना जीवन का उपयोग करना है,समय का दुरपयोग करना जीवन को नष्ट करना है।समय किसी की भी प्रतीक्षा नहीं करता। वह प्रतिक्षण,मिनट ,घंटे ,दिन, महीने व वर्षों के रूप में निरंतर विलीन होता रहता है। एक बार हाथ से निकला जो समय वो फिर कभी वापस नहीं आता। काल का नियम है निरंतर बहते रहना।

  अस्त-व्यस्त जीवनशैली और व्यर्थ सी आदतें बहुमूल्य अवसरों को गँवा देते हैं जिससे अत्यंत ही जटिल समस्याएं पैदा हो जाती है। आसानी और सरलता से होनेवाले कार्य भी उलझकर रह जाता है। समय के सदुपयोग में ही जीवन की सार्थकता है। समय का पालन करना बहुत बड़ा गुण है।नियत समय पर निर्धारित काम करने की आदत ही शरीर और मन को संतुलन बनाये रखती है। वही व्यक्ति जीवन में सफल हुए हैं जिन्होंने समय की कीमत पहचानी है। सफलता के अवसर सभी के जीवन में आते हैं परन्तु समय का भी अनुकूल होना आवश्यक है। समय से हर कार्य हो तो अच्छे लगते हैं। जो व्यक्ति समय बरबाद करता है वही बाद में पछताता है और वक्त के थपेड़े खाता है।

“ गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा है -

     ‘’ का वर्षा जब कृषि सुखाने

        समय चूकि पुनि का पछिताने”

इन दिनों ऐसा समय है जिसमे एक पैर उत्थान की ओर और दूसरा पतन की नाव पर लोग रखते हैं। जीवन लक्ष्य से दूर होता जा रहा है। वर्तमान के समय का महत्त्व एवम् प्रभाव बहुत अधिक  है क्योंकि यही क्षण हमारे पास होता है। सदुपयोग या दुर्पयोग वर्तमान पल में ही संभव है। जो व्यक्ति वर्तमान क्षण में खड़े रहकर कुछ पाने का साहस रखता है, वही विरले जैसा होता है और सार्थक उपलब्धि हासिल करता है। वर्तमान ही भविष्य को आधार प्रदान करता है, जब यही क्षण दूर हो जाता है तो वही अतीत का कालखंड बन जाता है। अवसर चूक न जाये इसीलिए वर्तमान पल का सार्थक और समुचित उपयोग करना बेहद जरुरी है क्योंकि समय को अपनी अवहेलना बिल्कुल पसंद नहीं है।

        टिक-टिक-टिक घड़ी जो चलती

           हरपल कुछ पैगाम वो देती

          कर्म करो सब करो ना आलस

           टूट चूके तो कर लो साहस

           बीती पल ना आती वापस

           रूठो चाहे मनाओ हँस-हँस

           समय की बात न मानोगे

          कदम-कदम पर पछताओगे।

भारती दास ✍️                                                                      

Tuesday, 15 September 2026

ऋषिवर दधीचि

 देवासुर के महा-संग्राम में 

आसुरी शक्ति बढ़ी हुई थी 

देवगण सारे हताश हुए थे 

विजय की कोई आश नहीं थी।

दानव सेनापति वृत्रासुर था 

था उसका आतंक बहुत 

देवताओं की पराजय पर

दैत्यों में था हर्ष बहुत।

उसकी असीम शक्ति देखकर 

देवराज अति भयभीत हुए

संग सभी देवों को लेकर 

ब्रह्मा जी के पास गए।

साधारण अस्त्रों-शस्त्रों से 

उसका वध नहीं हो सकता 

उसके क्रूर अत्याचारों से 

रक्षा करें हे परमपिता।

परोपकारी महान त्यागी

शिवभक्त दयालु हैं दधीचि 

विश्व के कल्याण हेतु वे

उत्सर्ग करेंगे अपनी अस्थि।

प्रजापति ने कहा - देवों से 

ऋषि दधीचि के शरण में जाएँ

राक्षसों के विनाश के लिए 

अस्थि दान दें उन्हें बताएँ।

हाथ जोड़ नतमस्तक हो 

शचीपति ने नमन किया 

देवहित याचक बनकर वे 

महर्षि-आश्रम को गमन किया।

रोम-रोम खिल उठा ऋषि का

जब इन्द्र ने अस्थि की याचना की

योगबल से निज प्राण तजकर

युद्ध में जीत की कामना की।

ऋषिवर दधीचि के त्यागों को

देवताओं ने वंदन किया 

जीवन दायिनी दु:सह कार्य को 

सजल नयन से ग्रहण किया।

भीषण भयानक रण सागर में 

वृत्रासुर का बल चरम था

अट्टहास कर गर्जन करता 

पावक-ज्वाला सा कोप अगम था।

महाऋषि के सख्त हाड़ों से 

देवेंद्र ने वज्र का निर्माण किया 

उसी दिव्य वज्रास्त्र से ही 

वृत्रासुर का प्राण गया।

देवासुर के समरांगन में 

देवगणों की जीत हुई 

स्वर्ग के राजा बने पुरन्दर

सुरपुर की रीत पुनीत हुई।

श्रेष्ठ ऋषियों के कारण ही 

गर्वित है भारत का मस्तक 

परोपकार के लिए सदा ही 

प्राण-दान किये हैं अब-तक।

भारती दास ✍️ 


Wednesday, 26 August 2026

संस्कृत साहित्य

  

मध्य कालीन भारत में ज्ञान की विभिन्न शाखाओं में संस्कृत में लिखी गयी रचनाओं की संख्या बहुत बड़ी है| महान शंकराचार्य, रामानुज, माधवाचार्य,

वल्लभाचार्य आदि द्वारा अद्वैत दर्शन के क्षेत्र में संस्कृत भाषा में कई ग्रंथ लिखे जाते रहें है| उनके विचार तेजी से देश के विभिन्न भागों में प्रचारित-प्रसारित होते गये| मुस्लिम शासन वाले क्षेत्रों में विशिष्ट विद्यालयों और संस्थानों का जाल इस तरह बिछा हुआ था कि उनके कार्यों में हस्तक्षेप नही किया जा सकता था|

संत कवियों का दृष्टिकोण अत्यंत मानवतावादी था| उन्होंने सभी तरह के भावनाओं में प्रेम की भावनाओं को सबसे ज्यादा महत्त्व दिया| उन्होंने उस जाति-व्यवस्था की आलोचना कि जिनके अन्यायों से लोग त्रस्त थे|

मोक्ष की आशा लेकर भक्तों के रूप में दुष्टों के चंगुल से बचने का मार्ग दिखाया| बारहवीं और सोलहवीं सदियों के बीच हिन्दू धर्मशास्त्रों पर भारी संख्या में भाष्य और सार-संग्रह को लिखा गया| धर्मशास्त्रों के एक प्रसिद्द भाष्यकार बिहार के चंदेश्वर थे जो चौदहवीं सदी में हुए थे| उनके बाद बिहार, बंगाल, मिथिला और पश्चिमी भारत में लिखने वाले रचनाकारों को हिन्दू शासकों ने आश्रय दिया| जैनों ने भी संस्कृत के विकास में योगदान दिया जिसमें हेमचन्द्र सूरी सबसे ज्यादा विख्यात हुये| वे मुसमानों के दुर्व्यवहारों को उपेक्षित करते गये| इस्लामी रचनाओं को संस्कृत में अनुवाद का प्रयास किसी ने भी नहीं किया सिर्फ देश की राजनीती, धर्म और दर्शन के क्षेत्र में संपर्क भाषा के रूप में प्रयोग किया गया| क्षेत्रीय भाषा में भी उच्च कोटि की साहित्यिक रचनायें लिखी गयी| बौद्धों,जैनों और नाथपंथी सिद्धों ने अपनी रचनाओं को संस्कृत भाषा से स्थानीय भाषाओँ में अनुवाद किया, इसी वजह से संस्कृत भाषा की प्रतिष्ठा में कमी आई| भक्त संतों ने रामायण, महाभारत, भागवत आदि ग्रंथो का जनसाधारण की भाषाओं का प्रयोग किया जिससे साधरणलोग भी आसानी से पढ़ व समझ सकता था| रामानुज ने भक्ति और इश्वर के प्रति पूर्ण आत्मसमर्पण करने को जन-जन से अपील की| उन्होंने नये युग की चुनौतियों का सामना करने के लिए लोगों को तैयार किये| मुख्य रूप से संस्कृत पुस्तकों का ही विभिन्न भाषाओं में अनुवाद किया गया इस वजह से संस्कृत भाषा का अस्तित्व क्षीण होता गया|

[ मध्यकालीन भारत से ]

संस्कृत देवों की भाषा है,यह पवित्र वैदिक भाषा है।आज भी पूजा-पाठ में मंत्रों का उच्चारण संस्कृत में ही होता है। पहले सुभाषितानि तथा अनेकों सुंदर श्लोक को प्रतिदिन पढ़ा जाता था जिसके अर्थों को छात्र पठन - श्रवण और मनन करते थे। उदाहरण स्वरूप:-

" यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं सत्य करोति किम्

लोचनाभ्यां विहीनस्य दर्पण: किं करिस्यति "।

अर्थात् 

जिसके पास बुद्धि नहीं है उसको शास्त्र भला क्या कर सकता है जिस तरह अंधे लोगों के लिए दर्पण किसी काम का नहीं है।

" काव्यशास्त्र विनोदेन कालों गच्छति धीमतान्

व्यसनेन चs मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा "।

अर्थात् 

बुद्धिमान व्यक्ति अपना समय शास्त्रों के अध्ययन में बिताते हैं परंतु मूर्ख व्यक्ति अपना समय बुरी आदतों में,नींद में या कलह(लड़ाई-झगड़ों) में बिताते हैं।

[संस्कृत व्याकरण से]

इस वैदिक भाषा को अपनाकर अपनी संस्कृत और संस्कृति को बचाना चाहिए ताकि यह देव भाषा सुरक्षित रह सके।

जप-तप मंत्र के नाद ध्वनि 

संस्कृत के है शब्द मणि

संस्कृति के मूल आधार है 

जिन शब्दों में ज्ञान भंडार है।

गुरुदेव का करके वंदन

फिर करते थे छात्र पठन 

विपुल सुयश संतोष सदा था 

असीम सुखद संस्कार भरा था।

" धर्म-शास्त्रम् नीतिशास्त्रम्

वदति वेद: चs रामायणम्

सुजन: विनयो हि विभूषणम्

जयतु संस्कृतम् जयतु

 भारतम् "।

भारती दास ✍️    

Saturday, 1 August 2026

चिर बन्धु सा देकर अनुराग

 

पल दो पल बैठे थे पास

दोस्त मेरे जो थे कुछ खास

नहीं शिकायत कोई उनसे 

जिनको नहीं है वो क्षण याद।

दोस्त नहीं करता अभिमान

दोस्त नहीं होता धनवान

दोस्त प्रार्थना में रहता है

दोस्ती की है यही पहचान।

दोस्त है आशा और विश्वास 

दोस्त है कोमल सा एहसास 

चिर-बन्धु सा देकर अनुराग 

अधीर मन से हर लेता विषाद।

कृष्ण सुदामा मित्र हुए थे

नेत्र नीर से पग धोये थे

उनकी दोस्ती थी अनमोल

वे एक राजा एक रंक हुए थे।

भारती दास ✍️

Sunday, 26 July 2026

स्मृति में आये कलाम

 स्मृति के झरोखे से छनकर

अश्रुपूर्ण कुछ यादें आई

नहीं रहे भारत के रत्न 

शोक सन्देश थी सबने पाई।

राष्ट्रपति थे देश के वो पर

थे विनीत वे अति उदार 

ज्ञान-क्रांति के बने प्रवर्तक 

राष्ट्र के स्वप्न किये साकार।

अनुभवी थे तेजस्वी थे 

रखते थे सुन्दर विचार 

कर्म ही उनका ध्येय रहा था 

अंतिम-क्षण तक न माने हार।

पृथ्वी-अग्नि-ब्रम्होस मिसाइल 

अंतरिक्ष में थी उनकी ये देन

था शानदार व्यक्तित्व उनका 

कहलाते थे वे मिसाइल मैन।

सारी समस्याओं की जड़ है 

अज्ञानी और निर्धन होना 

इससे छुटकारा पाने को 

जन-जन को संकल्प है करना।

ह्रदय की सत्यता शांति देती 

सद्भाव सिखाता है व्यवहार 

कठोर परिश्रम चरित्र बनाता

प्रेम बसाता है परिवार।

भ्रष्टाचार-मुक्त हो जीवन

दूसरों के लिए बने मिशाल

प्रेरणा-भरी ये उनकी बातें 

बेशक बन गयी है बेमिशाल।

इस्लामी मजहब था उनका 

पढ़ते थे वे पाक कुरान

मानवता ही धर्म थी उनकी 

कर्म बना उनकी पहचान।

चाहत यही रही थी उनकी 

हो धरती का अनुपम सृजन 

सच्ची श्रद्धांजलि होगी उनकी 

अपनाये सब उनका चिंतन।

भारती दास ✍️           

    

Wednesday, 22 July 2026

छम-छम बरसती वर्षा रानी

 छम-छम बरसती वर्षा रानी 

उजली सी बूंदें लगती सुहानी....

खुशी है कहीं पर, कहीं पर हँसी है 

कहीं आपदा बनकर बरसी है 

सुख-दुःख जैसा ही उसकी कहानी 

छम-छम बरसती वर्षा रानी....

सरिता की धारा मद में बहती 

प्रलय स्वरुप बन नद में मिलती

तरल-गरल बन आती श्रावणी 

छम-छम बरसती वर्षा रानी....

चपला चमकती चूमती नभ को 

कौन-कहाँ पर प्राणी कब हो

क्षण में ही ज्वाला बनती दामिनी 

छम-छम बरसती वर्षा रानी....

सांध्य की सुंदर सी घनमाला

रमणीय लगती प्रकृति-बाला

मन अनुरागिनी वयस सयानी

छम-छम बरसती वर्षा रानी....

भारती दास ✍️ 


Friday, 19 June 2026

मौन का मंत्र सीख लेते हैं

 

पिता हमेशा देते हैं प्यार

सुरक्षा और संस्कार 

सशक्त सा सुविचार 

सजग सा कुलाचार 

स्वतंत्रता की गरिमा 

सरलता की महिमा 

समाज में सर्वत्र सम्मान 

अस्तित्व की सुंदर पहचान 

मृदु स्वप्न का देकर पंख 

इन्द्रधनुषी सा स्नेह अंक

पीकर अवसाद का अश्क

निज का अधर रहता शुष्क  

होता है भले ढ़ेरों विषाद 

संतानों का करते हैं जयनाद

दुःख अनंत सब दर्द भूलाकर

सुख समस्त हर खुशी लुटाकर

मौन का मंत्र वो सीख लेते हैं 

सहर्ष उम्र भर जी लेते हैं।

भारती दास ✍️

Thursday, 11 June 2026

उद्देश्य सफल हो जाता है

 

आनंद स्त्रोत बह रहा निरंतर

क्यों उदास होता है ये मन 

चिर नवीन ये चिर पुराण है

अमृतमय सा सुख स्पंदन।

प्रकृति करती है परिवर्तन

विचलित होता जड़ व चेतन 

नभ में उड़ते विहग ये कहते

जीवन एक संग्राम है हर क्षण।

क्यों हताश होता है ये मन

क्यों निराशा देती है मार 

है शिथिलता कैसा मन में

क्यों जीवन लगता बेकार।

जग के निर्मम कोलाहल में

शांति डूबी जाती  है 

विषमता के इस फैशन में

स्व-ज्योति बुझी जाती है।

देशभक्ति का ढोंग है भारी

कर्त्तव्य भाव भी सच्ची नहीं

सेवा-शिष्टाचार नहीं तो

निर्ममता भी अच्छी नहीं।

कितनी रातें बीती सिसकती

कितने आँसू बहाते हम

कहाँ से आये कहाँ है जाना

सोचकर यह घबराते हम।

वायु का सुन्दरतम झोंका

सुखद स्पर्श कर जाता है 

पुष्प नये खिलते डाली पर

पल अगले ही मुरझा जाता है।

नूतन चोला धारण करके

जीवन यात्रा निकल जाता है 

प्रभु चरणों में नतमस्तक हो

उद्देश्य सफल हो जाता है। 

भारती दास ✍️

Friday, 15 May 2026

सावित्री-सत्यवान कथा


सावित्री सत्यवान की

है ये कथा पुरानी

सदियों से बस सुनती आयी

अनमिट प्रेम कहानी।

मद्र-देश के राजा अश्वपति थे

 क्षमाशील वे संतान रहित थे 

प्रभास-क्षेत्र में भ्रमण को आये 

ब्रम्हा-प्रिया से वर वो पाए।

कन्या रूप में उत्पन्न हुई 

अश्वपति  की  पुत्री  बनी 

कमल सामान विशाल नेत्र था 

अग्नि समान प्रचंडतेज था ।

राजकुमारी थी अति लाडली 

सावित्री  था  उसका  नाम 

सरस्वती सा रूप था मोहक 

पाई  थी  बुद्धि भी तमाम।

थक-हार  के  राजा बैठे थे 

योग्य वर  ना  मिला उन्हें 

किससे होगी शादी पुत्री की

 इसी  सोच  में  वे डूबे थे।

हे  पुत्री  मै हूँ शर्मिंदा

राजा  ने  कर  जोड़  लिए 

अपना वर तुम स्वयं ही ढूंढो

तुम पे सब कुछ छोड़ दिए।

सावित्री ने कहा पिताश्री 

आप  सदा  निश्चिन्त  रहें 

मै अपना वर ढूंढ पाऊँगी 

आप  सदा  आश्वस्त  रहें।

कई दिनों से  यात्रा करके  

सावित्री   थक  के  हारी 

क्या कहूँगी मै पिता से  

सोच  में  डूबी  थी सुकुमारी।   

एक कुमार जंगल में रहता 

दीखता बहुत  ही  प्यारा है

लम्बी भुजाएं ऊँचा मस्तक

गौरवर्ण   भी   न्यारा   है।

द्युमत्सेन एक राजा  थे  

पर   शत्रु   से   हारे   थे 

सत्यवान ही पुत्र थे उनके

जो माता-पिता  के  सहारे  थे।

सत्य  का  संभाषण  करना  

उनका  परम  धर्मं  था 

माता-पिता का सेवा करना

सत्यवान  का  कर्म  था।

मंत्र-मुग्ध हो गयी सावित्री

मन ही मन  दिल  हार गयी 

मन चाहा वर  मुझे मिला 

यह  सोचकर  मनुहार हुयी।

जिस कार्य से  वन को आयी  

वो  हुआ  पूर्ण वो मेरा काम 

अपना वर  मैंने  ढ़ूंढ़ लिया 

जो  होगा  मेरे  समान।

नारदजी  ने  बीच  में  टोका

सत्यवान  अल्पायु  है 

एक साल  ही  जीवित  रहेगा 

एक   दोष  क्षीणायु  है।

सावित्री  बोली  पिताजी 

एक  बार  देते   है   दान 

एक  बार  ही  शादी  होती

एक ही बार  होता  कन्यादान।

पहले का  युग  सतयुग  था 

वचन  की  महता  भारी थी   

जीवन  से  बढ़कर  वचन  थे 

जिस  पर  प्राण भी वारी थी।

राजकुमारी   की   शादी   

अतिशीघ्र   ही  हो  गयी 

सावित्री  सत्यवान  को  पाकर  

अत्यधिक ही  प्रसन्न  हुयी।

सास-ससुर नेत्र-हीन  थे

सेवा से वे संतुष्ट    हुए 

आशीष  देकर  सावित्री  को  

 दोनों   ही आश्वस्त  हुए।

हंसी- ख़ुशी  व्यतीत  हुए  दिन

बरस   करीब   आने   लगा 

विषाद   बनकर  मुनि  की  बातें 

मन  को  यूँ  घबराने लगा।

सत्यवान   जंगल  में   आये

 सावित्री  भी चुपचाप   चली 

अपने पति का  अनुगमन  कर

मन  में  कुछ तो सोच रही।

हुई  अचानक  सिर  में  पीड़ा  

सत्यवान  कराह उठे 

हे  सुंदरी  क्षणभर  सोऊंगा 

गोद  में  तेरी “आह” उठे।

 पीत-वस्त्र   - किरीट-धारी    

सूर्य  समान  उदित  हुए 

 एक   छाया   था  कृष्णवर्ण 

उसके   सम्मुख  प्रकट  हुए।

 सावित्री डरी नहीं   

वह केवल डटी रही 

 कर प्रणाम उन नर-श्रेष्ठ को   

मधुर  वचन  कहने लगी।

कौन  हैं  आप कहाँ से आये  

यहाँ किसलिए  आये हैं 

मैं समर्थ  हूँ अग्नि  समान 

मुझको  व्यर्थ  डराये हैं।

यमराज हूँ मैं, प्राण को लेता 

उचित दंड भी मैं तो देता

जिसकी होती आयु पूरी  

उसको लेने मैं  खुद आता।

यमराज  लेकर  के प्राण 

चलने लगे वो अपने धाम

सावित्री भी  साथ  चली 

होकर राहों से अंजान।

यमराज ने  कहा प्यार  से  

तुम नहीं संग आ सकती 

बिना आयु समाप्त  किये 

यमपुरी  नहीं जा सकती।

मुझे शर्म ना कोई हया है

मैं आपको नमन करती हूँ 

गैर किसी भी नर का नही

पति का अनुगमन करती हूँ।

स्त्रियों की गति उसके पति हैं 

आप जिसे लेकर चले

पति के बिना जीवन कैसा 

सपनों  की सब चिता जले। 

धरती पर  सबका  स्थान  

पर पतिहीन नारी का मान 

नहीं कभी हुआ यहाँ पर

नहीं  होता  उसका कल्याण।

हे पुत्री तुम कुछ वर मांगो 

लेकिन मेरे संग ना आओ 

यही प्रकृति का नियम बना है 

इसको समझो ना तुम घबराओ।

सावित्री ने राज्य को माँगा 

सास-ससुर के भाग्य को माँगा

जो खुशियाँ  रूठ चुकी थी 

उस बिखरे सौभाग्य को माँगा।

कुछ  दूर  आगे  जाने पर  

यमराज  कुछ  हर्षित  हुए 

लेकिन वो तो लौटी नहीं

वे  कुछ आश्चर्य-चकित हुए।

हे भामिनी क्यों जिद करती हो

क्यों अनहोनी तुम करती हो 

आजतक जो विधि ने चाहा

उसमें अड़चन क्यों बनती हो।

दूसरा कोई भी  वर मांगों

लेकिन अपने  जिद  को छोड़ो

ये जग  कितना सुन्दर  है

सुन्दरता  से मुंह  ना मोड़ो।

हे श्रेष्ठ पुरुष क्या कहूँ आपको 

मेरे लिए जग ही सूना है 

मेरे पति तो संग आपके 

जा रहे अब  क्या  जीना  है।

मेरे  पिता  को  सौ  पुत्र  हो 

मैं  भी  पुत्रवती  होऊँ 

ये वर मुझको दे दे आप

आप की भक्ति को मैं पाऊँ।

ऐसा  ही  हो  हे  पुत्री

पर  तुम  अब  वापस जाओ 

बिलम्ब करो ना यूँ मुझको 

तुम अपने घर को जाओ।

हे श्रेष्ठ पिता पुत्री माना

वर देकर जो मान दिया 

बिना पति के पुत्र हो कैसे 

ये कैसा सम्मान दिया।

हे पुत्री तुम जीत गयी 

तेरी भक्ति से मैं खुश हुआ 

सौभाग्यवती बन सदा रहो

तुमसे अमर ये जग हुआ।

सावित्री अपने पति के संग 

अपने घर वापस लौटी 

सास-ससुर को नेत्र मिला 

राज्य को पाकर निहाल उठी।

सौ भाई  की बहन बनी वो

सौ पुत्रों की  माता 

अमर हो गयी कई युगों तक 

सावित्री  की  यह गाथा।

अपनी धर्य विवेक के बल पर 

यमराज से भी लड़ पड़ी

अपने पति को वापस पाकर 

जग  में  वो  अमर  हुई।

सावित्री जैसा सौभाग्य 

हर नारी को मिले सदा

पति पुत्र संग वैभव मिले

मिले सर्वत्र यश संपदा।

भारतवर्ष की ये सब नारी

देश की  शान  बढाती हैं 

हमें गर्व है खुद पर क्योंकि 

हम भी भारत के वासी हैं।

भारती दास✍️

Friday, 1 May 2026

वर्तमान का व्यथित समय ये

वर्तमान का व्यथित समय ये 

परिवर्तन हो,माँग रहा है 

स्वार्थ और संकीर्णता से 

सदाचार भी जूझ रहा है।

धन बढ़ा है साधन बढ़ा है 

सुविधाएँ बढ़ी आराम बढ़ा है 

अन्याय का स्थान बढ़ा है 

शक-संदेह अभिमान बढ़ा है।

विप्लव और विध्वंस की

भ्रम-द्वंद और संघर्ष की

दुर्भावनाएँ अति हुई है 

तनाव-हिंसा और बैर-द्वेष की।

हृदय गगन में,प्रलय सा मन में 

पलक छलकता, शून्य नयन में 

आकांक्षाएँ सब मुखर हुईं है 

प्रतिकूल मलय के निर्णय क्षण में।

सुख की शुभ की मुद मंगल की

शुभ्र कल्याणमय मृदु चिंतन की

संभवनाएँ अब उदित हुई है 

प्राची भाल पर नवल किरण की।

भारती दास ✍️