Wednesday, 19 January 2022

अमन चैन का खींचते दामन.

 


अहंकार बल दर्प कामना

निज हठ को ही सत्य मानना

मिथ्या ज्ञान द्वेष भावना

पर-मानव की निंदा करना.

ऐसी वृत्ति आसुरी होती

अनिष्ट आचरण जिसकी होती

दोष ही दोष दिखाई देती

कर्तव्य बोध न सुनाई देती.

गीता में कहते नारायण

बार-बार गिरते हैं नराधम

जो विध्वंस का बनते कारण

अमन चैन का खींचते दामन.

अंत सुनिश्चित हो जाता है

जो क्रूर शठ हिंसक होता है

ब्रम्ह स्वरूप जो शिक्षक होते

हठी उदंड को दंडित करते.

तुलसी दास जी कहते साईं

दृष्ट का संग ना हो रघुराई

नरक वास भले हो गोसाईं

साथ ना हो जो करते बुराई.

दृग-गगरी जिसकी खुल जाये

ईश-अवतारी वही बन जाये

दुर्बल की लाठी वो कहाये

दीन की साथी बन मुस्काये.

भारती दास ✍️


Wednesday, 12 January 2022

एक प्रखर युवा तपस्वी

 (जन्मदिन-विशेष)

12  जनवरी सन 1863 की सुबह भारत देश के लिए प्रेरक सुबह थी .इसी दिन स्वामी विवेकानंद जी के रूप में ईश्वरीय सन्देश का अवतरण हुआ था .श्री रामकृष्ण परमहंस जी ने इस दैवी अवतरण की अनुभूति अपने समाधिस्थ चेतना में कर ली थी. उन्होंने बड़े ही सहज भाव से कहा - ’’नरेन्द्र को देखते ही मैं जान गया कि यही है वो जिसे देवों ने चुना है ‘’.स्वामी जी का बचपन का नाम नरेन्द्र था जो बाद में विश्ववन्द्य स्वामी विवेकानंद के नाम से विख्यात हुए .

            स्वामी जी की चेतना ने सदा ही भारत के युवाओं के ह्रदय को झंकृत किया है .श्री अरविन्द ,नेताजी सुभाषचंद्र बोस ,महात्मा गांधी,जवाहरलाल नेहरु तथा आज के भी कई नेताओं और युवाओं के आदर्श रहे हैं .उनका सुन्दर मुख ,आकर्षक व्यक्तित्व ,सिंह के समान साहस,निर्भय भाव तथा उनकी आखों की गहराई हमेशा प्राणी –मात्र के लिए करुणाका सागर दिखाई देता है .अशिक्षित पददलित व गरीब मनुष्यों के प्रति अपार प्रेम व पीड़ा दोनों ही दर्शित हुए है .उनके स्वरों में सिंह की गर्जन है ,मधुर संगीत का प्रवाह है असीम प्रेम है दृढ विश्वास भी है.संभवतः इसीलिए उनका प्रत्येक शब्द युवाओं के लिए ही ध्वनित हुआ है .उनकी बातों का प्रभाव विद्युत् तरंगों की भांति असर करती है .

              जब कोई भी आदमी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए परिश्रम करता है परन्तु असफल होने पर टूट जाता है उसे हताशा घेर लेती है और वो आत्महत्या का निर्णय लेता है या निराशा से समझौता कर लेता है ,उस समय स्वामीजी की कही हुई उक्तियाँ एक नया राह दिखाती है .उनके व्याख्यान का अल्पांश ;-----



      ‘’ असफलता तो जीवन का सौन्दर्य है. यदि तुम हजार बार भी असफल हो तो एक बार फिर सफल होने का प्रयत्न करो .उनका ही जीवन सौन्दर्यमय है जिनके जीवन में निरंतर संघर्ष है .मानव जीवन का संग्राम ऐसा युद्ध है जिसे हथियार से नहीं जीता जा सकता .यह ध्रुव सत्य है की शक्ति ही जीवन है दुर्बलता जीवन की मृत्यु है .शक्ति ही अनंत सुख है ,चिरंतन है शाश्वत प्रवाह है.दुर्बल मन के व्यक्ति के लिए इस जगत में ही नहीं किसी भी लोक में जगह नहीं है .दुर्बलता शारीरिक व मानसिक रूप से तनाव का कारण है ,चेतना की मृत्यु है और  इसीलिए सभी प्रकार की गुलामी की ओर ले जाता है .ऐसे फौलादी विचार व मजबूत इरादों वाले लोगो की जरुरत है जिनकी वृति लोभ और दोष से परे हों.आत्म शक्ति से भरा व्यक्ति असफलता को धूल के समान झटककर फेंक देता है और निःस्वार्थ मन से अपने जीवन को सुखमय बना देता है.संवेदना का भाव प्रवाहित हो ,सबके के लिए दर्द हो, गरीब,मूर्ख और पददलित मनुष्यों के दुःख को अनुभव करो.संवेदना से ह्रदय का स्पंदन बढ़ जाये या मष्तिष्क चकराने लगे और ऐसा लगे की हम पागल हो रहे हैं तो इश्वर के चरणों में अपना ह्रदय खोल दो तभी शक्ति सहायता और उत्साह का वेग मिल जायेगा.मैं अपने जीवन का मूल मंत्र बताता हूँ की प्रयत्न करते रहो जव अन्धकार ही अन्धकार दिखायी दे तब भी प्रयत्न करते रहो तुम्हारा लक्ष्य मिल जायेगा.क्या तुम जानते हो की इस देह के भीतर कितनी उर्जा,कितनी शक्तियां, कितने प्रकार के बल छिपे पड़े हैं सिर्फ उसे बाहर निकलने की जरुरत है .उस शक्ति व आनंद का अपार सागर समाये हो फिर भी कहते हो की हम दुर्बल हैं .

”(व्यावहारिक जीवन में वेदान्त से)


उठो, जागो,और ध्येय प्राप्ति तक रुको नहीं.


ये दिव्य चेतना ने जो देह धारण की थी वह आज भले ही न हो पर उनकी प्रखर तेजस्वी स्वरुप देश की युवाओं को प्रेरित करते हैं और करते रहेंगे.

भारती दास ✍️

Wednesday, 5 January 2022

मानते नहीं बच्चे बड़ों की बात


प्रमुख समस्या बनी है आज

मानते नहीं बच्चे बड़ों की बात

ज्ञान उपदेश वे नहीं समझते

भय दबाव से वे नहीं डरते

मोबाइल के संग में उलझे रहते

पढ़ाई-लिखाई में सहज न होते

माता पिता को समय नहीं है

गहन अनेकों तथ्य यही है

आसान नहीं है पालन पोषण

बाल निर्माण और अनुशासन

संग में उनके रहना पड़ता

हर मुश्किल को सुनना पड़ता

व्यवहार आचरण गढना पड़ता

चित्त को संयम रखना पड़ता

बाल मन को समझाना पड़ता

धीरज धारण करना पड़ता

माता पिता के कार्य कलाप

करते अनुसरण वे हर इक बात

थोड़ी कड़ाई थोड़ा प्यार

ना हो उपेक्षित सा व्यवहार

भावनात्मक हो उनका पोषण

हो व्यक्तित्व की जड़ों का सिंचन

बुरे लत का हो ना शिकार

सही दिशा में  मिले संस्कार

जीवन बहार बन खिल जायेगा

आदर्श मिशाल वो बन जायेगा.

भारती दास ✍️



Thursday, 30 December 2021

सर्वथा उत्कर्ष हो

 

महारोग इक विपदा बनकर
शोकाकुल कुंज बनाया है
बीते कल की व्यथा कथा से
प्रति घर में दर्द समाया है.
किसी का भाई पिता किसी का
किसी ने ममता गंवाया है
वातावरण की विषैलेपन से
व्याकुल मन घबराया है.
सर्वथा उत्कर्ष हो अब
ना हो कोई क्षोभ व गम
हर्ष ही हर्ष सहर्ष हो सब
सुखद सुभग बन आये क्षण.
विघ्न विहीन हो नया वर्ष ये
जन-जन में अनुराग भरे
नई सुबह की नव बेला से
दुख संताप विहाग हरे.
नव किसलय उल्लास बढाये
डाल-डाल पर खिले सुमन
स्वर्णिम लक्ष्य मिले जीवन में
पग पग पर हो नेह समर्पण.
भारती दास ✍️
(विहाग - वियोग)

Thursday, 23 December 2021

विशालकाय लिए बदन

 विशालकाय लिए बदन

सुगंध भी बहुत है कम

कहा अकड़ कर गुलाब

मुझसे महक रहा चमन.

गुलाब को घमंड था

निज रंग रूप गंध का

करता था हरदम बखान

मदमस्त सी सुगंध का.

मेरे बड़े शरीर पर

मां सरस्वती बैठकर

भरती है वीणा मे स्वर

ज्ञान का देती है वर.

सौंदर्य बना सौभाग्य है

हूं गंधहीन दुर्भाग्य है

बोला कमल - भाई गुलाब

मेरा यही तो भाग्य है.

हम देश के पहचान हैं

संवेदित मन प्राण हैं

चरित्र में नहीं दोष है

हम स्वार्थी ना महान हैं.

सौंदर्य और सुगंध जैसे

सहकार और सहयोग वैसे

दोनों के ही संयोग से

उन्नति होगा योग से.

हंस पड़ा फिर गुलाब

तोड़ कर अहं का भाव

दोनों ही हैं लाजबाव

हैं बेहतरीन बेहिसाब.

भारती दास ✍️



Tuesday, 14 December 2021

ज्ञान बड़ी या भक्ति

 


पूर्णचंद्र का अंतिम प्रहर था
मंद मंद चल रहा पवन था
गंगा की लहरें इठलाती
जैसे शैशव वय बलखाती
विश्वनाथ का पूजा अर्चन
करने बैठे ध्यान व वंदन
एकाग्र हो गई सहज चेतना
पूर्ण हो गयी सघन प्रार्थना
अज्ञानता का मिटा अंधेरा
चित्त से दूर हुआ भ्रम सारा
आम्र वृक्ष का मोहक बागान
सुगंधित पुष्प से सजा उद्यान
आचार्य शंकर बैठे थे मौन
ज्ञान-भक्ति में श्रेष्ठ है कौन
जन जन का क्लेश निवारण
अज्ञानी के भटकन का कारण
ज्ञान से जीवन सहज हो जाता
भक्ति प्रभु के पास ले आता
एक वृद्ध थे झुकी कमर थी
दंतहीन मुख दृष्टि सरल थी
हाथों में पुस्तक को थामें
आये थे शंकर से मिलने
कंपित स्वर से बोले विनीत
हे गुरुवर दें ज्ञान की भीख
विद्व जनो में होगा सम्मान
लोग कहेंगे श्रेष्ठ विद्वान
वृद्ध की मनोदशा समझकर
द्रवित हुये थे ये सब सुनकर
इतनी आयु होने पर भी
क्षीण हुयी ना तृष्णा मन की
इच्छाओं आशाओं में नहीं है
ज्ञान कभी शब्दों में नहीं है
दिवस रात्रि और सुबहो शाम
शिशिर बसंत आये तमाम
काल ने कर दी पूरी आयु
पर छोड़ न पाये इच्छा यूंही
मोक्ष समीप तो होने को है
ज्ञान काम न आने को है
हे महामना गोविंद को भजिये
भक्ति की महिमा समझिये
अब केवल है एक उपाय
गोविंद नाम से अमृत पाय
ज्ञान बिना जीवन दुखद है
अंत समय में भक्ति सुखद है
बिन भक्ति मोक्ष सहज नहीं है
ज्ञान भक्ति में भेद यही है
वृद्ध ने उन उपदेश को जाना
ज्ञान से बड़ी भक्ति को माना.
भारती दास ✍️






Friday, 10 December 2021

नमन अनेकों जनरल रावत

 न जाने कहां वो वीर गये

सर्वस्व न्योछावर कर गये

आतंकमुक्त कश्मीर थे करने

रहे लक्ष्य अधूरे थे पुराने सपने

किसे पता था छोड़ जायेंगे

सब से वादा तोड़ जायेंगे

वो राष्ट्र पुत्र रूला गये

इस देश को दहला गये

विघ्नों से वे डरते नहीं थे

अपने लिए जीते नहीं थे

कीर्ति उनकी अपार थी

सुख शांति की भरमार थी

हर वक्त साथ रही स्वामिनी

चली स्वर्ग तक वो भामिनी

अतिम सफर पर चले गये

अलविदा सबको कह गये

वो रहेंगे अब यादों में यथावत

नमन अनेकों जनरल रावत.

भारती दास ✍️


Friday, 3 December 2021

निराशा _____ हताश मन की व्यथा

 



नकारात्मक विचारों व भावनाओं के साये से घिरे रहनेवाले लोग ही ज्यादातर निराश दिखाई पड़ते है. आज की पीढ़ी के अधिकतर लोग हताशा भरी परिस्थिति का सामना करते हैं क्योंकि वे व्यवहार कुशल नहीं होते हैं .सामान्य जिन्दगी में भी अपने आपको असहाय महसूस करते हैं .मनोबल कमजोर होता है .अजीब सी उदासी से घिरा जीवन होता है .
        15 से 40 वर्ष के लोग इसी  उहापोह में जीवन व्यतीत करते हैं की हमारा अब कुछ नहीं होगा .वे सिर्फ अपने –आप में ही कमी ढूंढते दिखाई देते हैं. हर कामयाब आदमी से डर लगता है. लम्बे समय तक चलने वाली जद्दोजहद की वजह से मनःस्थिति हताशा में डूब जाती है. किसी भी कार्य को करने के लिए उत्साहित होने के बजाय  निराशाजनक भाव होता है. सही निर्णय लने की क्षमता नहीं रह जाती है. सकारात्मक सोच से दूर होने लगता है. मन हमेशा उदास ही रहता है.
                 निराशा[तनाव]यानि ‘’डिप्रेशन’’एक मानसिक रोग है. इस रोग में आदमी सामान्य चुनौती को भी नहीं स्वीकार कर पाता बल्कि अपना कदम पीछे हटा लेता है. खुशनुमा व्यक्तित्व नहीं रख पाता, डरा-डरा सहमा-सहमा सा माहौल रखता है. "डिप्रेशन"का एक कारण यह भी होता है की nyurotransmitre ठीक ढंग से कम नहीं करते है जिस वजह से निराशा देखने को मिलते है. कुछ अच्छा नहीं लगना, जल्दी थक जाना ये इसके लक्षण होते है. एक कारण यह भी हो सकता है कि जिन्दगी के प्रति सही समझ विकसित नहीं कर पाते है जिससे असफलता मिलती है. धीरे –धीरे अपनी क्षमताओं पर संदेह करने लगते है. एकाग्रता में कमी आने लगती है.
                 अपनी क्षमताओं का सही आकलन करने के लिए सबसे पहले मन को मजबूत बनाना होगा. सकारात्मक सोच के द्वारा अवसाद को मन से दूर भगाना होगा. चिंतन-मनन व अध्यात्मिक अध्ययन के द्वारा विचार शैली को बदलना होगा. स्वाध्याय से सुन्दर विचारों का पोषण मस्तिष्क को मिलेगा.
                 उपासना को नियमित दिनचर्या में शामिल करने से शंकाओं का नाश तथा खुद पे विश्वास बढ़ता है. भगवान के सानिध्य का एहसास होता है. हताशा-निराशा स्वतः नाश होती है. नियमित योग द्वारा भी मनःस्थिति शांत व प्रसन्न होती है. उगते हुए सूरज को नमस्कार करने से मन स्वस्थ व सक्रिय होते हैं.
                   इस बात का हमेशा ध्यान रखना चाहिए की हमें निराशा क्यों मिले. ईश्वर ने सबको बनाया है. हर किसी में कोई न कोई गुण जरुर दिया है. मुझमे भी कुछ गुण होगा ही, व्यवहार कुशल बनकर लोगों तक पहुंचकर अपना हताशा भगाना चाहिए. जबतक जीवन है हरदिन कुछ सीखने को मिलेगा. अपने को भी तौलते रहना चाहिए ताकि कमी को सुधार सकें. सुन्दर-सुखद जीवन व्यतीत करने के उपाय ढूंढना चाहिए. हँसना ,गाना व खिलखिलाना चाहिए.
                  महाकवि मैथिलीशरण गुप्तजी ने कहा है .........
    "नर हो न निराश करो मन को
    कुछ काम करो ,कुछ काम करो
    जग में रहकर निज नाम करो
    यह जन्म हुआ किस अर्थ कहो
    समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो
    कुछ तो उपयुक्त करो तन को
    नर हो न निराश करो मन को."
भारती दास ✍️

Saturday, 27 November 2021

पद्मश्री दुलारी देवी


अभावों में ही पली बढ़ी

नहीं थी कुछ भी लिखी पढी

मल्लाह परिवार में हुआ जनम

मुश्किलों से होता भरण पोषण

पति नहीं था ससुराल नहीं थी

एक बेटी थी जो जीवित नहीं थी

क़दम कदम पर दर्द व्यथा थी

संघर्षों की वो इक गाथा थी

झाड़ू पोछा छोड़ चली वो

रंगों की कूंची पकड़ चली वो

हाथों में कमाल की जादू था 

लगन संयम मन काबू में था 

गजब की चित्र बनाती थी

वो जिजीविषा बन जीती थी

उनके काम को नाम मिला

पद्मश्री का सम्मान मिला

एक प्रेरणा बनकर उभरी

जाति धर्म से ऊपर निखरी

कला ने दी सुंदर पहचान

बिहार की बेटी है दुलारी नाम.

भारती दास ✍️

Saturday, 13 November 2021

हमेशा रहती है दूर

 

एक सुशीला महिला

हमेशा रहती है दूर

शराब की विकृत भावों से

गंदी नजर की कुंठाओं से

अमीर पतियों की घपलेबाजी से

सुविधाओं की चोंचलेबाजी से

करती नहीं कभी गुरूर

हमेशा रहती है दूर....

एक कुलीना महिला

हमेशा रहती है दूर

अधूरे ज्ञान की प्रशंसा से

मित्र गणों की अनुशंसा से

बद आचरण की परिभाषा से

स्वतंत्र उत्थान की अभिलाषा से

होती नहीं कभी मगरुर

हमेशा रहती है दूर....

एक अबला सी महिला

हमेशा रहती है दूर

मंहगे तोहफे उपहारों से

लालच और व्यभिचारों से

खोखली झूठी आकांक्षाओं से

व्यर्थ सी कई इच्छाओं से

 होती नहीं बेबस मजबूर

हमेशा रहती है दूर....

भारती दास ✍️