Saturday, 10 April 2021

लोग नहीं करते हैं चिंतन

 


लापरवाही ने सब छीना
फिर रफ्तार से बढ़ा कोरोना
जानते हैं परिणाम की सीमा
फिर भी चाहते मौत से लड़ना.
गुजरे पल ने खूब सिखाया
समझाया मुश्किल से बचाया
जीवन मूल्य का भेद बताया
फिर भी सबने वही दुहराया.
कहते सुनते थके हर बार
सांसों के रक्षक गये हैं हार
दुख-अतिथि आ पहुंचा द्वार
लेकर ढेरों दर्द उपहार.
बदहाली से करने को जंग
गली-गली फिर हुए हैं बंद
लगे छूटने अपनों के संग
दूर हुये खुशियां-आनंद.
नेताओं की चुनावी रैली
अफरा तफरी जीवन शैली
भीड़-भाड़ उन्मादों वाली
बढ़ाता रहा कोरोना खाली.
अस्पताल में कम है साधन
संकट में है प्राण व जीवन
सेवा कर्मी करते परिश्रम
लोग नहीं करते हैं चिंतन.
भारती दास


 

 

 

Tuesday, 6 April 2021

अन्तर्मन भी हरपल कहता

 


      
      मूक बधिर हो या कोई व्यक्ति
      तलाश सुखों की होती सबकी
      चाहत होती हर एक मन की

हो भविष्य सदा सुंदर सी…
अनुकूल जहां होता है पोषण
अनुरुप वहां होता है बचपन
परंपरा संस्कार का दर्शन
दर्शाता परिवार का चित्रण…
अनुचित आदत रहन-सहन
दम तोड़ता प्रेम समर्पण
नहीं होता कोई अपनापन
दुर्भाग्य ढोंग का होता दर्पण…
शैशव में ही भरता विकार
पनपता रहता द्वेष अपार
टूटता-बिखरता घर संसार
मलते हाथ होते लाचार…
माता-पिता भी तब पछताते
जब महत्व पैसे को देते
बुरी आदतें घर कर जाते
स्वयं समाज से रहते अछूते…
कर्म की खेती चलता रहता
जो बोता है वही है फलता
अंतर्मन भी हर-पल कहता
बदी के बदले बदी ही मिलता…

भारती दास ✍️





 

 




 

 


Wednesday, 31 March 2021

मनाते मूर्ख दिवस अभिराम

 


मूर्ख बनाते या बन जाते
मखौल उड़ाते या उड़वाते
दोनों ही सूरत में आखिर
हंसते लोग तमाम
छेड़ते नैनों से मृदु-बाण....
मन बालक बन जाता पलभर
कौतुक क्रीड़ा करता क्षणभर
शैशव जैसे कोमल चित्त से
भूलते दर्प गुमान
होते अनुरागी मन-प्राण....
सरल अबोध उद्गार खुशी का
हंसता अधर नादान शिशु सा
क्लेश कष्ट दुख दैन्य भुला कर
सहते सब अपमान
देते शुभ संदेश ललाम....
मूर्ख दिवस का रीत बनाकर
सुर्ख लबों पर प्रीत सजाकर
मनहर हास पलक में भरकर
गाते खुशी से गान
मनाते मूर्ख दिवस अभिराम....
भारती दास ✍️ 

 

 

Saturday, 27 March 2021

मै कृतज्ञ हूं हे परमेश्वर

 

रुके-रुके से थके-थके से
कदम जोश से बढ़ेंगे फिर से
कई विघ्न के शिला पड़े थे
समस्त तन-मन हंसेंगे फिर से.....
तड़प-तड़प कर सहम-सहम कर
रात-दिन यूं ही कट रहे थे
उम्मीद आश की लिये पड़े थे
वासंती पुष्पें खिलेंगे फिर से.....
इंद्रधनुष की बहुरंगों सी
विचरते चित्त में भाव कई सी
द्वन्द के साये में जी रहे थे
सुनहरे पल-क्षण मिलेंगे फिर से.....
मैं कृतज्ञ हूं हे परमेश्वर
धन्यवाद करती हूं ईश्वर
अंधकार पथ में बिखरे थे
छंद आनंद के लिखेंगे फिर से.....
भारती दास



 

Sunday, 7 March 2021

मैं धीर सुता मैं नारी हूं

 


सलिल कण के जैसी हूं मैं
कभी कहीं भी मिल जाती हूं
रीत कोई हो या कोई रस्में
आसानी से ढल जाती हूं.
व्योम के जैसे हूं विशाल भी
और लघु रूप आकार हूं मैं
वेश कोई भी धारण कर लूं
स्नेह करूण अवतार हूं मैं.
अस्थि मांस का मैं भी पुतला
तप्त रक्त की धार हूं मैं
बेरहमी से कैसे कुचलते
क्या नरभक्षी आहार हूं मैं.
अर्द्ध वसन में लिपटी तन ये
ढोती मजदूरी का भार हूं मैं
क्षुधा मिटाने के खातिर ही
जाती किसी के द्वार हूं मैं.
मैं धीर सुता मैं नारी हूं
सृष्टि का श्रृंगार हूं मैं
हर रुपों में जूझती रहती
राग विविध झंकार हूं मैं.
भारती दास



 

 

 

Tuesday, 23 February 2021

विभा वसंत की छायी भू पर

 

विभा वसंत की छायी भू पर
कण-कण में मद प्यार भरा है
आलिंगन में भरने को आतुर
गगन भी बांहें पसार खड़ा है.
दमक रहा है इन्दु-आनन
सिमट-सिमट तन लजा रहा है
अलसायी अलकों में जैसे
उन्माद प्रेम का सजा रहा है.
पवन तोड़ कर बंधन सारा
मुख कलियों का चूम रहा है
कौन हीन है कौन श्रेष्ठ है
संग सभी के झूम रहा है.
भवन-भवन में मगन-मगन में
मदमस्त होकर घूम रहा है
भूमि-अंबर के ओर-छोर में
विचर कहीं भी खूब रहा है.
इच्छाओं का चंचल सिंधु
मन-तरंग में डूब रहा है
विवश-विकल-विविध पीड़ा से
सुख वसंत भी जूझ रहा है.
सुने यही थे कभी पढे थे
अनंग-रुप अवतार रहा है
क्यों कुसुमाकर बेबस होकर
सौम्य-रुप नकार रहा है.
भारती दास








 



Sunday, 14 February 2021

जय भगवती भारती

 

जय भगवती भारती
जगतवंदिनी पीड़ा हरती
पद्मवासिनी विद्या देती
मां सकल विश्व तारती
जय भगवती भारती....
रुप मनोहर अतिशय सुंदर
शुभता भर दे उर के अंदर
मां श्वेत वस्त्र धारती

जय भगवती भारती....
कर में वीणा राग सुना दे
ब्रह्माप्रिया अनुराग सिखा दे
मां करते हम आरती
जय भगवती भारती....

भारती दास


 

 

Tuesday, 2 February 2021

प्रकृति का मंगल वरदान


 

बीती रजनी दिनकर जागा
हंसती आई स्वर्णिम आभा
मंद पवन बहता मादक सा
भीनी-भीनी सुगंध सुमन का.
विटप पत्र से छनकर आती
माघ की मीठी धूप सुहाती
सौंदर्य सुधा से सुरभित धरती
सविता देव की मृदु अनुभूति.
व्याकुलता तृष्णा के मारे
देख न पाते नयन हमारे
मादक मोहक चारो ओर
बिखरा है आनंद विभोर.
अन्न जल वसुधा ही देती
रत्नगर्भा कहाती धरती
धरणी के दो हाथे बनकर
श्रम करते उत्साह से भरकर.
हरी-भरी फसलें इठलाती
लह-लह कर ये खेतें हंसती
है प्रकृति का मंगल वरदान
कण-कण में फैला अनुदान.
भारती दास

 

Sunday, 24 January 2021

हम भारत पुत्र महान हैं

 

हम भारत पुत्र महान हैं
युगों-युगों से जहां पर बहती
पावन गंगा धाम है,
हम भारत पुत्र महान हैं....
अन्नपूर्णा है धरती सारी
रुप विधाता किसान हैं,
हम भारत पुत्र महान हैं....
साहस शौर्य दिखाते सैनिक
रक्त बहाते जवान हैं,
हम भारत पुत्र महान हैं...
जिन गाथा में पूर्वज बसते
सत्य स्वरूप भगवान हैं,
हम भारत पुत्र महान हैं....
हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई
धर्म सभी के समान हैं,
हम भारत पुत्र महान हैं....
भारती दास



 

 

Friday, 15 January 2021

चांद के घर में बैठे सुख से

 



जीवन के निरंतरता में
याद नदी सी बहती रहेगी
दूर हुये क्यों सबसे बिछड़कर
मां की ममता बिलखती रहेगी.
चोट मिली है सारी उमर की
कातर करूणा सिसकती रहेगी
कौन समझता दर्द किसी का 
वहशी ये दुनिया हंसती रहेगी.
चांद के घर में बैठे सुख से
विकल सी आंखें झड़ती रहेगी
प्रारब्ध बड़ा है जीवन छोटा
मौन व्यथा ये कहती रहेगी.
सूने-सूने से वृन्तों पर
पुष्प कली फिर खिलती रहेगी
अर्पित है भावों के गूंचे
स्नेह की लौ जलती ही रहेगी.
भारती दास ✍️
भाईजी की छठी पुण्य तिथि पर श्रद्धांजलि