Sunday, 12 September 2021

 मैं हिन्दी हूं मैं हिन्दी हूं

भारत के भाल की बिन्दी हूं

जैसे सूरज चांद चमकते

वैसे कपाल पर सजती हूं

मैं हिन्दी हूं मैं हिन्दी हूं....

रुप सरस्वती अन्नपूर्णा सी

हंसी है मनहर मां लक्ष्मी सी

मैं सुंदर शोभित लगती हूं

मैं हिन्दी हूं मैं हिन्दी हूं....

गिरि शिखर की महिमा जैसी

ऋषि मुनि की वेद ऋचा सी

हर मुख से भाषित होती हूं

मैं हिन्दी हूं मैं हिन्दी हूं....

संस्कृत है मेरी जननी

मै हूं उसकी प्यारी भगिनी

मैं दिलों में सबके रहती हूं

मैं हिन्दी हूं मैं हिन्दी....

अनपढ गंवार की बोली हूं

शिक्षित की हंसी ठिठोली हूं

मैं प्रेम ही प्रेम समझती हूं

मैं हिन्दी हूं मैं हिन्दी....

भारती दास ✍️

हिन्दी दिवस की शुभकामनाएं


Friday, 3 September 2021

शिक्षक दिवस

 

राधा-कृष्णन के जन्म-दिन पर

शिक्षक दिवस मनाते हैं 

उनके सुन्दर सद्चिन्तन से 

जन-जन प्रेरणा पाते हैं.

श्रेष्ठ चिन्तक और मनीषी 

आदर्श शिक्षक थे महान

शिक्षा की क्रांति लाने में

अहम् था उनका योगदान.

सामान्य नहीं होते हैं शिक्षक 

वो होते हैं शिल्पकार

गीली मिटटी को संवारनेवाला

जैसे होते हैं कुंभकार .

शिक्षा का ये रूप नहीं है 

हो केवल अक्षर का ज्ञान 

पथ के तिमिर मिटाने वाले

शिक्षक होते ज्योति समान.

संयम सेवा अनुशासन का

वो देते हैं सदा प्रशिक्षण 

जीने की वो कला सिखाते 

सहज-सरल बनाते जीवन. 

शिक्षक होते पथ प्रदर्शक 

वो होते मन के आधार 

मानव-मूल्यों को सिंचित करके

उर में भरते सुभग विचार.

शिक्षण के महत्त्व को समझे 

सार्थक हो इनकी पहचान    

बस प्रतीक का पर्व बने ना

पावन हो शिक्षक की शान.

भारती दास ✍️

शिक्षक दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं

Friday, 27 August 2021

योगेश्वर श्रीकृष्ण (जन्म-कथा)

 





मेघगर्जन की धुन के साथ रिम-झिम के गीतों को गाती हुई, हरियाली की चादर ओढ़कर प्रकृति सम्पूर्णता के साथ उत्सव मना रही है. सृष्टि के रचयिता के जन्म का उत्सव है. प्रकृति की इस उत्साह से जीवन के अनेक रंग सजीव हो उठती है. वातावरण में जैसे अनेकों संकेत, कई रहस्य छुपे हों ऐसा महसूस होता है.

      भगवान श्री कृष्ण का जन्म उत्सव बड़े ही धूम-धाम से मनाया जाता है. कई हजार वर्ष पूर्व भारत अत्यधिक ही सम्पन्न था. समृद्ध एवम शक्तिशाली देश था. लोगों में स्फूर्ति थी, उमंग था परन्तु बहुत दिनों तक ये स्थिर नहीं रह सका. अत्याचार बढ़ने लगा, शासक निरंकुश होने लगा, प्रजा त्रस्त हो उठी, इसी समयाकालीन भगवान श्री कृष्ण का जन्म हुआ. उस समय मथुरा का शासक कंस था. बहुत ही क्रूर स्वाभाव का था. उसने अपनी बहन देवकी और बहनोई वसुदेव को कारागार में डाल दिया क्योंकि देवकी के आठवे पुत्र से उसकी मृत्यु निश्चित थी. समयानुसार देवकी के सभी सात पुत्र कंस द्वारा मारे गए थे.

" भाद्र कृष्ण पक्ष अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में उनका जन्म हुआ था. नीरव काली डरावनी रात थी, घनघोर बरसात हो रही थी, गंभीर गर्जन के साथ दामिनी चमक जाती थी. यमुना में गरजती लहरे उन्माद की भांति शोर मचा रही थी.  कंस के डर से वसुदेवजी इतनी भयावनी रात में भी जल्द से जल्द अपने मित्र के घर इस नवजात शिशु को पहुँचाना चाहते थे. भगवान की लीला से यमुना ने उन्हें रास्ता दिया और भगवान शेष ने वृष्टि से बचने के लिए अपने फन फैला दिये. गोकुल पहुँचकर वसुदेव ने देखा कि नन्द की पत्नी यशोदा ने एक पुत्री को जन्म दिया है. इस अवसर का लाभ उठाकर वसुदेव ने अपने पुत्र को रखकर यशोदा की पुत्री को उठा लाये. कारागार के सभी द्वार फिर से बंद हो गए,सारी स्थिति पूर्ववत हो गयी. कंस उस आठवे संतान को मारने के लिए आया ये जानते हुए कि देवकी को पुत्री हुई है. उसने अपनी बहन की एक भी दर्द भरी प्रार्थना नहीं सुनी. निर्दयतापूर्वक उस शिशु को मारने के पत्थर पर पटकना चाहा कि वो आकाश में उड़  गयी और कंस को संबोधित करते हुए बोली कि उसको मारनेवाला जन्म ले लिया है वो अपनी आसुरी वृति को छोड़ दे तथा देवकी के प्रति क्रूर ना बने. ‘’

       "  कृष्ण-कथा से ] "

   " श्री कृष्ण प्रतिभावान थे. उनहोंने कई अत्याचारियों का वध किये थे. बचपन से ही अनेक लीलाओं से लोगों को मोहित करते थे. एक पर एक आई विपत्तियों को अपनी बुद्धि-बल के द्वारा निरस्त कर देते थे. गोप-गोपी-ग्वाला के साथ आनंदित बचपन गुजारे थे. राधा उनकी प्रेमिका थी. वो विवाहिता थी इसलिए वे दोनों  अपने जीवन काल में कभी मिल नहीं पाये. उनकी बांसुरी की धुन से राधा सम्मोहित होती थी. अपने कर्तव्य को वो सर्वश्रेष्ठ मानते थे. धर्म को व्यवस्थित करना चाहते थे. एक सम्पूर्ण पुरुष बनकर समाज को नयी दिशा देना चाहते थे. कौरव-पाण्डव के युद्ध में शांति-दूत बनकर गए थे लेकिन कपटी दुर्योधन ने उनकी एक न सुनी थी. उस युद्ध में भी उनहोंने धर्म के पथ चलकर पाण्डव के साथ थे.

अर्जुन को रणक्षेत्र में गीता का ज्ञान दी थी. श्री कृष्ण ने उन्हें समझाया कि मनुष्य, देह नहीं एक आत्मा है जिसे कोई भी नहीं मार सकता. आत्मा सिर्फ नये कपड़ों की तरह, नये शरीर धारण करती है. आत्मा ईश्वर का अंश रुप होती है. ये  कभी वृद्ध नही होती है. मनुष्य केवल कर्तव्य कर सकता है परिणाम पर उनका अधिकार नहीं होता. परिणाम की विफलता और सफलता दोनों में समान भाव रखना चहिये. श्री कृष्ण के ये उपदेश अमृत वचन है. उनके कारण ही महाभारत का युद्ध सबसे बड़ा युद्ध माना जाता है जिसमें धर्म की अधर्म पर, न्याय की अन्याय पर तथा सत्य की असत्य पर विजय हुई थी. गीता जैसी पवित्र ग्रन्थ निकली थी. "

श्री कृष्ण सभी दिव्य गुणों से सम्पन्न थे. अनगिनत प्रेम लीलाएं की थी परन्तु सदा योगी की तरह ही रहे इसीलिए उन्हें योगेश्वर भी कहा गया है. उनके चरित्र को जीवन में उतारने की कोशिश हो यही उनके जन्म-दिन पर कामना करती हूँ.

मथुरा में जन्मे थे कृष्ण

गोकुल में पले थे कृष्ण

धर्म के रथ पर, कर्म की पथ पर 

जीवन भर चले थे कृष्ण . 

भारती दास ✍️


Friday, 20 August 2021

पृथ्वी का उत्सव ऋतु वर्षा

 

तपती हुई ग्रीष्म के बाद

बारिश की पड़ती है फुहार

प्राण दायिनी वर्षा से ही

जीवन में होता संचार.

उमड़ घुमड़ कर काले बादल

लयबद्ध संगीत सुनाते हैं  

नभ का सीना चीरती चपला

करते भयभीत डराते हैं.

गरजते मेघ कड़कती बिजली

नाचते मयूर पपीहे कुहुकते

झींगुर दादुर के सुर ताल

उर के तार तरंगित करते.

हरीतिमा की चादर ओढ

प्रकृति नयी सी सजती है

मनोहारी नव छटा मोहती

उल्लास सुखद सी लगती है.

आनंद दाता ही नहीं है घन

सेवा भी सिखलाते हैं

अपना ही अस्तित्व मिटाकर

जलप्रदान कर देते है.

पृथ्वी का उत्सव ऋतु वर्षा

अभिनव सृजन करता है

कई सुंदर त्योहार सजाकर

अनगिनत उपहार ले आता है.

भारती दास ✍️



Friday, 30 July 2021

दोस्त मन के होते चिकित्सक

 


कहते ज्ञानी कवि विशारद
दोस्त मन के होते चिकित्सक
अवसाद मिटाते होते सहायक
दूर भगाते गम के सायक.
रखते विचार भावना शुद्ध
करते नहीं वो पथ अवरुद्ध
साझा करते सुख और दुख
मुश्किल में नहीं होते विमुख.
आनंद-हंसी बरसाते हैं
अवगुण तमाम अपनाते हैं
पलकों से पीड़ा हरते हैं
पुलकित अंकों में भरते हैं.
मुसीबत में देते हैं साथ
गिरने पर नहीं छोड़ते हाथ
करते सदा ही हित की बात
मित्र नहीं देते कभी घात.
लेकिन बदल गया परिवेश
मित्रों की पहचान और वेश
सच्ची मित्रता नहीं है शेष
परिभाषा अब बनी विशेष.
टिका स्वार्थ पर है ये रिश्ता
कुत्सित हो गई है मानसिकता
चित्त का वो सुंदर कोमलता
सिमट गई मित्र की पावनता.
भारती दास ✍️

Friday, 23 July 2021

गुरु दीप की ज्योति जैसे

 

गुरु ब्रह्म हैं गुरु रूद्र हैं

गुरु ईश अवतार हैं

गुरु की महिमा सबसे व्यापक

गुरु ज्ञान साकार हैं.

गुरु बोध हैं गुरु ध्यान हैं

गुरु सकल संस्कार हैं

गुरु दीप की ज्योति जैसे

हरते मन के विकार हैं.

गुरु वर्ण हैं गुरु सृजन हैं

गुरु स्वरूप भगवान हैं

गुरु तपन हैं गुरु नमन हैं

गुरु मोक्ष का नाम हैं.

कुंभकार का रुप गुरु हैं

गुरु श्रेष्ठ सम्मान हैं

जीवन सीख से पोषित करते

हम करते उन्हें प्रणाम हैं.

भारती दास ✍️

Friday, 16 July 2021

यह जीवन एक कल्पवृक्ष है

  यह जीवन एक कल्पवृक्ष है

 जो दुर्लभ रुप से मिलते हैं

"ईश्वर अंश जीव अविनाशी"

ऋषि मुनि भी कहते हैं.

अद्वितीय सी कृति ब्रह्म की

अद्भुत कार्य सब करते हैं

लक्ष्य अगर ना हो जीने का

पशुवत जीवन जीते हैं.

सबसे अलग विशिष्ट बनाते

उपलब्धि वो पाते हैं

बहुमूल्य सा हर एक पल को

उम्मीद बना हर्षाते हैं.

आत्मदेवता की अराधना

जो निर्मल मन से करते हैं

स्वस्थ चिंतन-मनन की शक्ति

उनमें सहज ही रहते हैं.

मात्र स्वार्थ वृत्ति के कारण

वो दानव कहलाते हैं

अहंकार का साधन बनकर

चैन कभी ना पाते हैं.

अनंत देव हैं सर्वश्रेष्ठ है

निरोगी काया का उपहार

भगवान सदा ही खुश होते हैं

बरसाते उनपर उपकार.

भारती दास ✍️


Saturday, 3 July 2021

स्वप्न सुनहरे सजाने चली है


मृदुल हास से विमल आस से
स्वप्न सुनहरे सजाने चली है
संघर्ष अनंत था श्रांत वर्ष था
हर्ष का दीप जलाने चली है.....
मौन मनन करती थी हरपल
पाठ गहन पढती थी पलपल
पर अधीर विचलित होती थीं
करुण नयन चिंतित होती थी
अनंत फ़िक्र सब दूर हटा कर
मृदु हृदय हरसाने चली है
स्वप्न सुनहरे सजाने चली है.....
चिकित्सा के विस्तृत आंगन में
मुदित मगन पुलकित हो मन में
नव अवसर को अंक लगाकर
अरमानों के पंख लगाकर
खुशी-खुशी से कर्म के पथ पर
निज कर्तव्य निभाने चली है
स्वप्न सुनहरे सजाने चली है.....
मानवता की सेवा करना
स्नेह सरलता सदा ही रखना
कदमों में यश और वैभव हो
चिर सुरभित जीवन का पथ हो
नई उमंग से उत्साहित हो
मधुर अधर मुस्काने चली है
स्वप्न सुनहरे सजाने चली है.....
भारती दास ✍️

Friday, 25 June 2021

जब सुख संध्या घिर आती है


जब सुख संध्या घिर आती है

अनुराग-राग बरसाती है

जब सुख संध्या घिर आती है....

सूर्य किरण ढल जाती थककर

सांझ स्नेह बरसाती सजकर

अरुनाभ अधर मुस्काती है

जब सुख संध्या घिर आती है....

प्रफुल्ल उरों से धूल उड़ाते

संग कृषक के पशु घर आते

आह्लाद सूकून भर लाती है

जब सुख संध्या घिर आती है....

निशा नशीली आती मनाने

भाल चूम लगती हर्षाने

रक्ताभ नजर इठलाती है

जब सुख संध्या घिर आती है....

भारती दास ✍️


Saturday, 19 June 2021

दृष्टि फलक पर टिक जाती है

 

अब पिता जी नही है साथ

सहेज रखी है स्नेह सौगात

गम कड़वे अवसाद भूलाकर

अपने सारे दर्द छुपाकर

करते थे परवाह सदा ही

दिखाते हरदम राह खुदा सी

विधि ने छीना पिता की साया

आठ वर्ष होने को आया

मन कांपा था दिल दहला था

उनके बिना जब दिवस ढला था

दिन अनेकों गुजर गये हैं

यादें हृदय में ठहर गये हैं 

क्लेश दंश सब मोह को तजकर

छोड़ चले सबको पृथ्वी पर

शाश्वत सत्य में लीन हुये थे

पुनीत गंगा में विलीन हुये थे

गर्वित हो झुक जाता शीश

जैसे पिताजी देते आशीष

आंखें बहकर थक जाती है

दृष्टि फलक पर टिक जाती है.

भारती दास ✍️