Friday, 1 May 2026

वर्तमान का व्यथित समय ये

वर्तमान का व्यथित समय ये 

परिवर्तन हो,माँग रहा है 

स्वार्थ और संकीर्णता से 

सदाचार भी जूझ रहा है।

धन बढ़ा है साधन बढ़ा है 

सुविधाएँ बढ़ी आराम बढ़ा है 

अन्याय का स्थान बढ़ा है 

शक-संदेह अभिमान बढ़ा है।

विप्लव और विध्वंस की

भ्रम-द्वंद और संघर्ष की

दुर्भावनाएँ अति हुई है 

तनाव-हिंसा और बैर-द्वेष की।

हृदय गगन में,प्रलय सा मन में 

पलक छलकता, शून्य नयन में 

आकांक्षाएँ सब मुखर हुईं है 

प्रतिकूल मलय के निर्णय क्षण में।

सुख की शुभ की मुद मंगल की

शुभ्र कल्याणमय मृदु चिंतन की

संभवनाएँ अब उदित हुई है 

प्राची भाल पर नवल किरण की।

भारती दास ✍️