अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा-सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का एक सुनहरा अवसर पितृपक्ष होता है। शास्त्रों के आधार पर भगवान विष्णु चार महीनों के लिए शयन योग में लीन होते हैं,इस दौरान देवताओं को संसार चलाने को जिम्मेदारी होती है। इसी क्रम में सोलह दिन पितृगण भी इस संसार को चलाते हैं तथा अपने वंशजों के द्वारा पूजे जाते हैं।उनके वंशज उनको याद करते हैं और कहते हैं कि हे पितृदेव आप थे तभी तो मैं हूँ। अपने पूर्वजों को श्रद्धावत नमन करते हैं उनके हर सुंदर प्रयासों के लिए कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।
मनुष्य जब भी जन्म लेता है तो माता-पिता से ही तन-मन और स्पंदन पाता है। चलना-बोलना, हँसना-रोना, पढ़ना-लिखना सबकुछ माता-पिता है सिखाते हैं, अनगिनत शैतानियों को झेलते हैं फिर भी माता-पिता कभी दुखी और उदास नहीं होते हैं, बल्कि अपने बच्चों की तरक्की व उन्नति की कामना करते हैं। उनकी खुशी के लिए अपने हर-दर्द को छुपाकर मुस्कुराते हैं। परन्तु जब बच्चों की बारी आती है तब वही माता-पिता बेकार और बोझ लगने लगते हैं। उनके सभी एहसानों को नजर अंदाज करते हैं,उनको एहसास कराते हैं कि आपने मेरे लिए कुछ भी नहीं किया। उनसे दूरी बना लेते हैं, उनसे बातें करना छोड़ देते हैं उनको वो हर पीड़ा देते हैं जिसकी माता-पिता को अंदाजा तक नहीं होता है।इस तरह की मानसिक समस्याओं से लड़ते-लड़ते एक दिन वे इस दुनिया से चले जाते हैं।
पितृपक्ष के दौरान वही बच्चे उनकी आत्मा की शांति के लिए अनेक आयोजन करते हैं। ब्राह्मण भोज, दान-दक्षिणा सबकुछ अच्छा करने के लिए प्रतिबद्ध होते हैं। पर लोग जानते नहीं हैं कि जीते जी जिन माता-पिता को प्यार-सम्मान नहीं मिलता है वो श्राद्ध में दिया गया खाना और दान-दक्षिणा कुछ भी स्वीकार नहीं करते हैं। इसलिए अपने माता-पिता को जीते जी प्यार और सम्मान जरूर देना चाहिए ताकि परलोकवासी सदा खुश व प्रसन्न रहें। तीर्थयात्रा, दान-दक्षिणा, तप यज्ञ, तर्पण के साथ-साथ, पुत्र और पुत्री की सेवा, श्रद्धा-भक्ति से भी पूर्वजों को शांति-तृप्ति और मुक्ति मिलती है।संकट के समय वे अदृश्य रूप से रक्षा करके सही राह भी दिखाते हैं।
अपने पूर्वजों के लिए कृतज्ञता अर्पित करने वाले पुत्र व पुत्री सदैव दीर्घायु और यशस्वी होकर जीवन जीते हैं।
पितृदेवाय नमः।
बाबूजी की तेरहवीं बरसी पर सादर श्रद्धांजलि 🙏🙏
भारती दास ✍️