Friday, 14 August 2015

देश हमारा हिंदुस्तान



संघर्षों के कठिन सफर में
यातनाओं के पीड़ित प्रहार में
अश्क भरी आखों में सपने
था संजोया सेनानी अपने
रुंधे गले से गाया था गान
देश पे होना है कुर्बान.
सालों पहले हुये स्वाधीन
दशा-दिशा अब भी गमगीन
मस्तिष्क भ्रमित है विचारहीन
संघर्ष-रत है दीन हीन
विपदाओं से होकर परेशान
आहुति प्राण का दे रहे किसान.
लोभ-लालच की राहें चुनकर
आत्मघाती बन रहा निरंतर
अंतर में निष्ठुरता भरकर
जान गंवाता जानें लेकर
क्या उनका था यही अरमान
जो देश पर हो चुके बलिदान.
पवित्र-तीर्थ भूमि के समान
देश है अपना हिंदुस्तान
संस्कृति है इसकी पहचान
गीता गंगा गौ महान
आन है इसके कर्मठ किसान
शान पर इसके मिटते हैं जवान.    
भारती दास ✍️  
          

Friday, 7 August 2015

भारत है गांवों का देश



भारत है गावों का देश
हरियाली है इसकी वेश
रीति-रस्म-रिवाज विशेष
उपेक्षित कुंठित नेत्र निमेष.
बुराइयाँ हो लाखों हजार
वो होते हों भले गंवार
उर में उनके बसते है प्यार
निश्छल प्रेम करते व्यवहार.
कभी होते सूखे से बेहाल
कभी बाढ़ों से होते बदहाल
धन से भी होते तंगहाल
फिर भी जीते हैं हर हाल.
सम्पूर्ण जगत का प्राण आधार
वहां पर फसलें होती तैयार
जहाँ ना होती कोई सुधार 
जहाँ गरीबी है बेशुमार.
रफ़्तार की उस दौड़ से अनभिज्ञ है
जिस शोर से आहत हुआ मर्मज्ञ है
जन  हितैषी और विवेकी विज्ञ है
मिष्टभाषी पारदर्शी सर्वज्ञ है.
समस्या का हो निराकरण
सुन्दर सुविधा हो परिपूरण
सरल सुलभ हो आवागमन
क्यों करे फिर कोई पलायन.
गाँव बदले तो बदलेगा देश
साक्षरता में संभलेगा देश
विकासशील कहलायेगा देश
अतुल रम्य बन जायेगा देश.
भारती दास ✍️ 

Thursday, 30 July 2015

व्यास-गुरु-पूर्णिमा



अक्षर बोध ही नहीं कराते
वो  देते हैं  शक्ति का पूंज.
जीवन भर का चिंतन देते,
भरते चेतना का अनुगूँज.
गुरु रूप नारायण होते,
जो हरते पथ के अंधकार.
पतन-पराभव की पीड़ा से,
वो लेते तत्काल उबार.
देह शिष्य है प्राण गुरु है,
मन शिष्य तो गुरु विचार.
संबंधों की अनुभूति में,
गुरु-शिष्य का  है आधार.
राम-कृष्ण पुरुषार्थ बनाया,
और विवेका सा विद्वान.
ऐसे समर्थ गुरु को नमन है,
जो करते हैं पोषित सद्ज्ञान.
कुरुक्षेत्र-रणक्षेत्र बना था,
जहाँ गवाये लाखों जान.
रक्त ही रक्त का प्यासा बनकर,
ले लिए थे अपनों के प्राण.
पद-पंकज में वंदन उनको,
जिसने लिखे थे ग्रन्थ महान.
उनके ज्ञान की रश्मि से ही,
देश है अपना प्रकाशवान.     
   भारती दास ✍️ 
       

Friday, 24 July 2015

आषाढ़ी संध्या घिर आई



श्याम रंग घन नभ में छाया
आषाढ़ का मास सघन हो आया
वर्षा का परिचित स्वर सुनकर
नाच रहा मन झूम-झूम कर
पादप-विटप लता-तरुओं पर
दूर-दूर बिखरे-सूखों पर
उमड़-घुमड़ कर मेघ ये बरसा
प्यासी धरती का मन हर्षा
घिरे हुए है घन कजरारे
मनमोहक सुन्दर ये नज़ारे
झड़ी लगी है कितनी मनहर
बरस रहे हैं बादल झड़-झड़
बारिश के मनभावन पल में
विरहानल है कोलाहल में
दामन छूकर पवन झकोरे
उन्माद भर रहा मन में मेरे
मेरा मन पंछी सा चहके
उर-उपवन में सुमन सा महके
अभिलाषा है इन नैनन की
मोहक माया देखूं प्रकृति की
कम्पित होता है अंतर्मन
होता है कुछ ह्रदय में पुलकन
शर्माती सकुचाती आई
भाव अनेकों जगाती आई
श्यामल नेह लुटाती आई
आषाढ़ी संध्या घिर आई.        
भारती दास ✍️