Wednesday, 26 August 2026

संस्कृत साहित्य

  

मध्य कालीन भारत में ज्ञान की विभिन्न शाखाओं में संस्कृत में लिखी गयी रचनाओं की संख्या बहुत बड़ी है| महान शंकराचार्य, रामानुज, माधवाचार्य,

वल्लभाचार्य आदि द्वारा अद्वैत दर्शन के क्षेत्र में संस्कृत भाषा में कई ग्रंथ लिखे जाते रहें है| उनके विचार तेजी से देश के विभिन्न भागों में प्रचारित-प्रसारित होते गये| मुस्लिम शासन वाले क्षेत्रों में विशिष्ट विद्यालयों और संस्थानों का जाल इस तरह बिछा हुआ था कि उनके कार्यों में हस्तक्षेप नही किया जा सकता था|

संत कवियों का दृष्टिकोण अत्यंत मानवतावादी था| उन्होंने सभी तरह के भावनाओं में प्रेम की भावनाओं को सबसे ज्यादा महत्त्व दिया| उन्होंने उस जाति-व्यवस्था की आलोचना कि जिनके अन्यायों से लोग त्रस्त थे|

मोक्ष की आशा लेकर भक्तों के रूप में दुष्टों के चंगुल से बचने का मार्ग दिखाया| बारहवीं और सोलहवीं सदियों के बीच हिन्दू धर्मशास्त्रों पर भारी संख्या में भाष्य और सार-संग्रह को लिखा गया| धर्मशास्त्रों के एक प्रसिद्द भाष्यकार बिहार के चंदेश्वर थे जो चौदहवीं सदी में हुए थे| उनके बाद बिहार, बंगाल, मिथिला और पश्चिमी भारत में लिखने वाले रचनाकारों को हिन्दू शासकों ने आश्रय दिया| जैनों ने भी संस्कृत के विकास में योगदान दिया जिसमें हेमचन्द्र सूरी सबसे ज्यादा विख्यात हुये| वे मुसमानों के दुर्व्यवहारों को उपेक्षित करते गये| इस्लामी रचनाओं को संस्कृत में अनुवाद का प्रयास किसी ने भी नहीं किया सिर्फ देश की राजनीती, धर्म और दर्शन के क्षेत्र में संपर्क भाषा के रूप में प्रयोग किया गया| क्षेत्रीय भाषा में भी उच्च कोटि की साहित्यिक रचनायें लिखी गयी| बौद्धों,जैनों और नाथपंथी सिद्धों ने अपनी रचनाओं को संस्कृत भाषा से स्थानीय भाषाओँ में अनुवाद किया, इसी वजह से संस्कृत भाषा की प्रतिष्ठा में कमी आई| भक्त संतों ने रामायण, महाभारत, भागवत आदि ग्रंथो का जनसाधारण की भाषाओं का प्रयोग किया जिससे साधरणलोग भी आसानी से पढ़ व समझ सकता था| रामानुज ने भक्ति और इश्वर के प्रति पूर्ण आत्मसमर्पण करने को जन-जन से अपील की| उन्होंने नये युग की चुनौतियों का सामना करने के लिए लोगों को तैयार किये| मुख्य रूप से संस्कृत पुस्तकों का ही विभिन्न भाषाओं में अनुवाद किया गया इस वजह से संस्कृत भाषा का अस्तित्व क्षीण होता गया|

[ मध्यकालीन भारत से ]

संस्कृत देवों की भाषा है,यह पवित्र वैदिक भाषा है।आज भी पूजा-पाठ में मंत्रों का उच्चारण संस्कृत में ही होता है। पहले सुभाषितानि तथा अनेकों सुंदर श्लोक को प्रतिदिन पढ़ा जाता था जिसके अर्थों को छात्र पठन - श्रवण और मनन करते थे। उदाहरण स्वरूप:-

" यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं सत्य करोति किम्

लोचनाभ्यां विहीनस्य दर्पण: किं करिस्यति "।

अर्थात् 

जिसके पास बुद्धि नहीं है उसको शास्त्र भला क्या कर सकता है जिस तरह अंधे लोगों के लिए दर्पण किसी काम का नहीं है।

" काव्यशास्त्र विनोदेन कालों गच्छति धीमतान्

व्यसनेन चs मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा "।

अर्थात् 

बुद्धिमान व्यक्ति अपना समय शास्त्रों के अध्ययन में बिताते हैं परंतु मूर्ख व्यक्ति अपना समय बुरी आदतों में,नींद में या कलह(लड़ाई-झगड़ों) में बिताते हैं।

[संस्कृत व्याकरण से]

इस वैदिक भाषा को अपनाकर अपनी संस्कृत और संस्कृति को बचाना चाहिए ताकि यह देव भाषा सुरक्षित रह सके।

जप-तप मंत्र के नाद ध्वनि 

संस्कृत के है शब्द मणि

संस्कृति के मूल आधार है 

जिन शब्दों में ज्ञान भंडार है।

गुरुदेव का करके वंदन

फिर करते थे छात्र पठन 

विपुल सुयश संतोष सदा था 

असीम सुखद संस्कार भरा था।

" धर्म-शास्त्रम् नीतिशास्त्रम्

वदति वेद: चs रामायणम्

सुजन: विनयो हि विभूषणम्

जयतु संस्कृतम् जयतु

 भारतम् "।

भारती दास ✍️    

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