Saturday, 1 August 2026

चिर बन्धु सा देकर अनुराग

 

पल दो पल बैठे थे पास

दोस्त मेरे जो थे कुछ खास

नहीं शिकायत कोई उनसे 

जिनको नहीं है वो क्षण याद।

दोस्त नहीं करता अभिमान

दोस्त नहीं होता धनवान

दोस्त प्रार्थना में रहता है

दोस्ती की है यही पहचान।

दोस्त है आशा और विश्वास 

दोस्त है कोमल सा एहसास 

चिर-बन्धु सा देकर अनुराग 

अधीर मन से हर लेता विषाद।

कृष्ण सुदामा मित्र हुए थे

नेत्र नीर से पग धोये थे

उनकी दोस्ती थी अनमोल

वे एक राजा एक रंक हुए थे।

भारती दास ✍️

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