Saturday, 6 April 2019

जिसकी महिमा का प्रसार


जिसकी महिमा का प्रसार
धरती पाताल गगन में
नारी की शक्ति की गरिमा
दौड़ रहा है कण-कण में.
मूर्ति बनकर सिमट के बैठी
संशय कैसे बताऊं मां
सिद्धियां सारी धारण करती 
कहलाती सुखदाई मां.
करने को तेरा सुख-स्वागत 
घर-घर सजा है मंगलमय घट
रोम-रोम हो उठा है पुलकित
अर्पित है चरणों में मस्तक.
भारती दास ✍️ 


 चैत्र नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनायें 

Friday, 29 March 2019

दृग-व्योम से क्यों बरसा है


कुछ तो बता ऐ मन
क्या है तेरी उलझन
दृग-व्योम से क्यों बरसा है
व्याकुल अश्रुकण, कुछ तो....
दूर अनंत है प्रीतम का घर
धीरे धीरे बढ़ तू चलकर
पथ में हो शूलों का वन
या दुर्गम हो क्षण, कुछ तो....
पल-पल मिटते पल-पल बनते
क्षण-क्षण मरते क्षण-क्षण जीते
कर ना तू क्रंदन,
कर सुंदर चिन्तन, कुछ तो....
जबतक है सांसों का उद्गम
जग अपना है सबसे बंधन
मांग ले अपनापन
स्वप्न में कर विचरण, कुछ तो....
भारती दास ✍️ 

Wednesday, 20 March 2019

आई होली धूम मचाता


तरुण तान गलियों में गाता
आई होली धूम मचाता
हाथ बढ़ाकर द्वेष भुलाता
प्रेम प्रीत का रंग लगाता.
भाई चारे का ढंग सिखाता
त्योहार हमें संदेश ये देता
समरसता पलकों में समाता
संताप हृदय का दूर  भगाता.
रक्ताभ अरूण धरती से कहता
अभिनव सुंदर रुप सुहाता
चिर मिलन की है विह्वलता
प्रणय की मदिरा दृग से बहता.
दिग-दिगंत में है मादकता
हर्ष उमंग अंगों में भरता
सुभग कामना दिल ये करता
रहे सुखद होली की शुभता।
भारती दास ✍️ 


Sunday, 3 March 2019

हे सर्वज्ञ हे गौरी-शंकर


करती हूँ मैं विनय निरंतर
निराकार निर्मल निर्गुण की
शुभता भर दें वेदना हर लें
पवित्र-भूमि की हर कण-कण की.
शुभ्र दीप्त अलोक की लौ से
रोशन कर दें उर का अंतर
रोग शोक परिताप मिटा दें
हर लें सब अभिशाप धरा पर.
हे सर्वज्ञ हे त्रिकालदर्शी
हे समर्थ देव हे गौरीशंकर
मंगल की अविरल वर्षा से
हर्षित कर दें धरती-अंबर.

Friday, 22 February 2019

उसका करार भी खो गया


अनुबंध था उत्कर्ष का
सम्बन्ध था दुःख-हर्ष का
व्यापार था खुदगर्ज का
उसका करार भी खो गया.
दिया अनंत सम्मान था
पहचान था अभिमान था
जिसने बना नादान था
उसका करार भी खो गया.
जो रक्त पीता ही रहा
हरवक्त जीता ही रहा
जो दैत्य बन हंसता रहा
उसका करार भी खो गया.
जिसने मिटाया सुख-सुहाग
माता-पिता-बहनों की याद
जिसके ह्रदय में दहका आग
उसका करार भी खो गया.
मधुमय वसंत अनुराग था
कलरव जहाँ उल्लास था
जिसने किया सब नाश था
उसका करार भी खो गया.        

Wednesday, 20 February 2019

अहले वतन तू कर ना गम

अहले वतन तू कर ना गम
तेरे पुत्र ने बांधा कफ़न
जिसने किया तुझपर सितम
उसका मिटा देंगे भरम.
हमने तो खाई है कसम
तेरे लिए निकलेगा दम
इच्छाओं का करके दमन
अर्पण करेंगे तन ये मन.
पहलू में हरपल मैं रहूं
कदमों में रखकर शीश यूं
है आरज़ू यही जूस्तजू
दामन में भर दूं मैं लहू.
ना चैन है ना करार है
सीने में दर्द अपार है
अश्कों की बहती धार है
रोती सिसकती बहार है.
क्यों कांपता ये पहाड़ है
खोया कहां हुंकार है
क्या भूल है क्या विकार है
क्यों हार ये स्वीकार है.
दुष्कर्म का ही प्रचार है
साक्षी सकल संसार है
उपचार हो ये पुकार है
करना नहीं उपकार है.

Saturday, 9 February 2019

चिर बसंत फिर घर आये

चिर बसंत फिर घर आये
था सूना ये मन का आंगन
उपहार प्यार का भर लाये
चिर बसंत फिर घर आये...
मैं एकांत में टूट रही थी
गम विषाद से जूझ रही थी
मौन पड़ा था कोना कोना
विवश विकल सब भूल रही थी
उदगार द्वार फिर भर लाये
चिर बसंत फिर घर आये...
पुष्प वृंत पर फिर खिल आया
गीत मधुर मधुकर ने गाया
नव पत्रों से तरु तन दमके
विहग शाख पर मुस्काया
खुमार बहार फिर भर लाये...
उस अतीत की,अतिशय सुख की
प्रमुदित-दृगकी,प्रफुल्लित-गृहकी
सुभग सरल उस मंजू मुख की
अनंत शोक दुःख विस्मृत कर के 
अपार दुलार फिर भर लाये
चिर बसंत फिर घर आये...
करती हूं शिकवा तूल ना देना
फिर कुसुमाकर भूल ना जाना
जीवन के इस दोपहरी में
फिर सुख सागर रुठ ना जाना
मनुहार उदार फिर भर लाये
चिर बसंत फिर घर आये... 
भारती दास ✍️

Saturday, 26 January 2019

मातृभूमि के लिये


पर्ण-पर्ण पर लहर-लहर पर
उन्मुक्त-उन्नत शिखर-शिखर पर
उल्लासता की बिखरी आभा
धरा-गगन में मचल-मचल कर.
भारत की आत्मा जागी जब  
आशाओं का संचार हुआ
अभिव्यक्ति का माहौल बना
प्रजातंत्र का अधिकार हुआ.
गँवा दिया था गौरव-गरिमा
उपेक्षित जीवन था मजबूर
नारी और निर्बल पर होता
अत्याचार हरदम भरपूर.
विकल दृगों में करुणा होती
दयनीय था वात्सल्य दुलार
दर्द-ग्लानि से दग्ध ह्रदय था
अनुचित था विकृत व्यवहार.
इसी भूमि पर जन्म लिये थे
मनमोहन मुरलीधर श्याम
जिनकी मुख से गीता निकली
दिए जिन्होंने ज्ञान तमाम.
थे आचार्य कभी विश्व में
योग्यता जिनकी अभिराम
हो गौरवमय वही संस्कृति
पावनता हो वही तमाम.
मातृ-भूमि के लिये जो
प्राण दे सुर तुल्य है.
देश के हित के लिये
सद्कर्म का भी मूल्य है।
भारती दास ✍️    

  

Saturday, 22 December 2018

ये शीत रैन करते बेचैन

सूर्यदेव हो चले हैं अस्त
निज रश्मियों को लिए समेट
प्रभात का चिन्ह रहा न शेष
रातों ने अपनी सजायी सेज.
हुए दूर सघनता में विलीन
नभ की अनंतता है असीम
दिनकर की किरणें हुई है क्षीण
आभा हुई मुख की मलीन.
ये दिवस ढला दीपक जला
आलोक घर घर में भरा
द्वारों पर मौन गहरा रहा
गलियों में सन्नाटा बढ़ा.
रैन बसेरा बनकर बड़े
है अनगिनत तरुवर खड़े
आश्रय विहीन आकर ठहरे
है समीर सांझ की दुःखभरे.
ये शीत रैन करते बेचैन
हरते है चैन जगते है नैन
कंपित है तन विचलित है मन
दंडित हुआ जैसे चमन.
रजनी कुपित है भयावनी
बैठी है छुप के तरुवासिनी
कहती है घर की भामिनी
निष्ठुर बड़ी है यामिनी.
भारती दास ✍️ 

Sunday, 9 December 2018

शिशिर धूप जब आती है


ऊषा अपनी पंख पसारे
कोमल-कोमल कुसुम-कली पर
ओस की बूंदें लगते प्यारे.
निशीथ सबेरा है सुहावना
बिखरी धरा पर स्वर्ण-ज्योत्सना
पुलक भरी मादक भरी
ह्रदय में भरती स्नेह भावना.
निशा पराजित हो जाती है
होकर मौन वो सो जाती है
मंद-मंद हंसता है प्रभात
शिशिर धूप जब आती है.
सांय-सांय बहता है पवन
सिहर-सिहर उठता है बदन
रवि-किरण तन को छूती है
अनुरागी हो जाता है नयन.
नन्हें-नन्हें श्वान-पुत्र
कूं-कूं करता है नेत्र-मूंद
इन पशुओं का नहीं है गेह
स्नेहिल-ऊष्मा से पाता सुख.
नीरवता बन जाती सहेली
निर्ममता करती अठखेली
हंसता-गाता क्षण ये कहता
ये जीवन है एक पहेली।
भारती दास ✍️