Sunday, 2 April 2023

श्रम का मूल्य

 शून्य रुप में पड़ी थी मिट्टी

सबकी ठोकरें खाती थी

मन मसोस कर रहती थी

बिना लक्ष्य के जीती थी.

एक कुम्हार ने आकर श्रम से 

मिट्टी को खोदा और गूंथा था 

फिर चाक पर खूब घुमाकर

आगों के अंदर झोंका था.

तपकर जलकर उस मिट्टी ने

अनेक रुपों में आकार लिया 

मटका बनकर प्यास बुझाई

गमलों में स्वप्न साकार किया.

श्रम का मूल्य सदा मिलता है

तन का भी होता उपयोग

बेशक कष्टों से होता सामना

लेकिन सुकर्म का होता योग.

बदल स्वयं को सद्कर्म करे जो

वो सर्व हितकारी बन जाता है

अपराधी दुष्कर्मी अधर्मी 

विध्वंस कारी बनकर जीता हैं.

भारती दास ✍️

Wednesday, 29 March 2023

आया पावन मंगलकारी

 आया पावन मंगलकारी

श्री रामचंद्र का जन्म दिवस

हे प्रेरणाओं के प्रकाश पूंज 

हर लो धरती से अज्ञान तमस.

असुर अंत करने के हेतु

नारायण ने अवतार लिया

संस्कृति के आदर्शों को

कण कण में साकार किया.

एक पत्नी का व्रत लेकर

हर नारी को सम्मान दिया

बहुपतियों के कुरीतियों से

समाज का कल्याण किया.

हे पुरुषोत्तम  पौरुष महान

समत्व भाव का नेह जगाओ

हे आदर्श रूप भक्तों के प्राण

अंतस से कल्मष मिटाओ.

भारती दास ✍️


Sunday, 19 March 2023

वो पाठशाला कहाते हैं

 देवमंदिर के प्रांगण जैसे

श्रद्धावत शीश नवाते हैं

जीवन-पाठ जहां पर पढ़ते

वो पाठशाला कहाते हैं.

हर दिन कुछ नया सिखाते

शिष्टाचार समझाते हैं

अनुशासन की सीख से सारे

सदाचार अपनाते हैं.

उज्जवल भविष्य जहां पर देते

अमूल्य ज्ञान सब पाते हैं

सद वाचन से पोषित करते 

सरल सौम्य बनाते हैं.

पवित्र-पावन हरदम होता 

गुरु शिष्य के नाते हैं 

पथ सुभग आनंदित होता

ज्ञान लक्ष्य को पाते हैं.

भारती दास ✍️



Saturday, 11 March 2023

भ्रष्टाचार

 


अभी अचानक नहीं है निकला,              
मानव हृदय को जिसने कुचला,                
विविध रूपधर भर धरती में
अवलोक रहा है बारंबार
फ़ैल रहा  है भ्रष्टाचार....
ज्ञान नहीं है,तर्क नहीं है
जन है जग है मोह कई है
कला नहीं है भाव विवेचन
दयनीय है जीवन के सार
फ़ैल रहा  है भ्रष्टाचार....
कौन सन्देशा बांटें घर-घर,
किसके भरोसे चले हम पथ पर
किसके जीवन का हो उपकार
नष्ट-भ्रष्ट है व्यक्ति संसार
फ़ैल रहा  है भ्रष्टाचार....
जोर-शोर से कभी चिल्लाकर,
कभी हवा में महल बनाकर,
फिर विलीन हो जाते सहसा,
घोष भरा विप्लव अपार
फ़ैल रहा  है भ्रष्टाचार....
निर्भयता थी जिनकी विभूति
पावनता अबोध थी जिनकी
जो शिवरूप सत्य था सुन्दर
बिखर गए जग के श्रृंगार
फ़ैल रहा  है भ्रष्टाचार....
आह्लाद कभी तो अश्रुविषाद
वेद विख्यात मिथ्या नहीं बात
कल को नहीं किसी की याद
जगत की कातर चीत्कार
फ़ैल रहा  है भ्रष्टाचार....
लूटकर परसुख सदा निरंतर
जीविका हरते मूढ़ सा मर्मर
मानव मन कुछ तो चिंतन कर
जीवन के सन्देश थे चार
फ़ैल रहा  है भ्रष्टाचार....
जीवन हो रहा उपेक्षित
लक्ष्य कर्म दृष्टि से वर्जित
प्रेरणाशक्ति क्यूँ है वंचित
कल को रच दो  नवसंसार
फ़ैल रहा  है भ्रष्टाचार....
गिन के हैं सब के दिनचार
फिर भी मची है हाहाकार
युग-युग के अमृत आदर्श
विम्बित करती है जीवन भार
फ़ैल रहा  है भ्रष्टाचार....
कर्मठ विनम्र मंगलपथ साधक
सत्य न्याय सदगुण आराधक
जन-जन बने अगर आविष्कारक
लोकहित का जो करे विस्तार
फ़ैल रहा  है भ्रष्टाचार....
हे विधि फिर सुवासित कर दो
इस जग को अनुशासित कर दो
हे दयामय फिर लौटा दो
आनंद उमंग और शिष्टाचार
फ़ैल रहा है भ्रष्टाचार....
भारती दास ✍️

Saturday, 4 March 2023

हे बसंत तुम सुनो पुकार

 हे बसंत तुम सुनो पुकार

यूं बीमार कर मुस्काते हो

क्यों बैरी सा करते व्यवहार

हे बसंत तुम सुनो पुकार....

तेरे आने से ही पहले

कांप उठा मन उर भी दहले

संभल संभलकर मैं हूं रहती

फिर भी कर देते लाचार

हे बसंत तुम सुनो पुकार....

सालों से नहीं खेली होली

रंग गुलाल और हंसी ठिठोली 

देख देखकर मैं हूं तरसती

रोता बिलखता चित्त बेजार

हे बसंत तुम सुनो पुकार....

तेरी खूबी अब नहीं लिखूंगी

मजबूरी सब अपनी कहूंगी

रिश्ते नाते मित्र समझते

जाती नहीं मैं किसी के द्वार

हे बसंत तुम सुनो पुकार....

कहते लोग है बसंत सुहाना

मैं देती हूं तुमको ताना

दुआ में सारी रातें गुजरती

जाऊं कहीं ना जीवन हार

हे बसंत तुम सुनो पुकार....

भारती दास ✍️

Saturday, 25 February 2023

ऐ जाग जाग मन अज्ञानी

 


ऐ जाग जाग मन अज्ञानी

ये जग है माया की नगरी

अभिमान न कर खल-लोभ न कर

सब रह जायेगा यहीं पर धरी

ऐ जाग.......

लघु जीवन है ये सोच जरा

सब मिथ्या है ये सत्य बड़ा

मत विचलित हो उत्साह बढ़ा

कर कर्म सभी गर्वों से भरी

ऐ जाग.......

निज स्वप्न में डूबे मत रहना

ये मोह है रोग तू सच कहना

आनंद भरा जीवन पथ हो

गुजरे सुन्दर ये पल ये घड़ी

ऐ जाग.......

अब क्या मांगू फैलाकर हाथ

          विधि ने ही सजाया दिन और रात  

ये रात गुजर ही जायेगी 

      दिन निकलेगा किरणों से भरी

ऐ जाग.........

भारती दास ✍️


 

Saturday, 11 February 2023

पुष्प


पुष्प
वृक्ष के ह्रदय  का
आनंद होता पुष्प
उल्लास अभिव्यक्ति का
आवाज होता पुष्प
पवित्र भावनाओं का
प्रतीक होता पुष्प
सुकोमल संवेदना का
चित्र होता पुष्प
कहता है सुमन
हे श्रेष्ठ मानव जन
निराशा के कुहासे से
जरा बाहर निकल
हो जा समर्पित लक्ष्य में
फूलों के समान
है धरोहर सीख मेरी
गहरी सी मुस्कान
कल्पना में रंग भरकर
उड़ चलो ऊँची उड़ान
मस्त रहे उन्मुक्त हो कर
है जब तक ये अपनी जान.

भारती दास ✍️

Saturday, 4 February 2023

तुलसी के मानस में राम

 


ह्रदय के सुन्दरतम भूमि में

जिनके बुद्धि हुये महान

मेघ रूप वो साधु बनकर

बरसाये मंगल घट गान.

सुन्दर शीतल सुखदाई सम

मानसरोवर के वो नाम

मंगलकारी तुलसी जी के

मानस में रहते हैं राम.

जनहित के हर सूत्र पिरोकर

युग प्रश्नों का कर समाधान.

भक्ति साधना की अनुभूति से

निहाल होते हैं विवेकवान.

बहुरंगे कमलों का दल हो

वैसे ही दोहा छंद की पंक्ति

सुन्दर भाव अनुपम सी भाषा

जैसे पराग सुगंध की शक्ति.

बंधकर भी निर्बंध रहे जो

मोहपाश में कभी ना आये 

कष्ट सहिष्णु परम भक्त वो

खल गण के भी उर में समाये.

निर्मल मन ही वह माली है

जिस पर ज्ञान का लगता फूल

भगवत्प्रेम के जल से सींचकर

कुटिल मन होते अनुकूल.

मानस के सातों सीढी से

जीवन सार दिये हैं सबको

रामचरित को रचने वाले

उनके चरणों में नमन अनेकों.

भारती दास ✍️


Wednesday, 25 January 2023

सरस्वती वंदना

 हे सरस्वती जय मां भगवती

हंस वाहिनी कुमति तू हरती ....

प्रनत पालिनी जय जगदम्बे

पुस्तक धारिणी मूढ़ता हर दे

विद्या बुद्धि ज्ञान बढ़ाती

हंस वाहिनी कुमति तू हरती....

तेरी महिमा मैं क्या जानूं

जड़ बुद्धि हूं क्या पहचानू

वीणा में संगीत जो भरती

हंस वाहिनी कुमति तू हरती....

पद्म वासिनी मुझको वर दे

मेरे उर में अमृत भर दे

अज्ञानों में तू ही विचरती

हंस वाहिनी कुमति तू हरती....

भारती दास ✍️

Thursday, 12 January 2023

पहाड़ का दर्द

 पहाड़ का दर्द या दुख का पहाड़

इस हाल का कौन है जिम्मेदार

सूनी गलियां सूना आंगन

है दहशत में सबका आनन

भींगे नयनो में आह भरा है 

पीड़ा करूणा अथाह भरा है 

उत्कर्ष का अवसर गौण हुआ 

तप-ज्ञान प्रखर भी मौन हुआ 

ये श्रृंग जब तक था सुखद

परमार्थ की सेवा में था रत

अब सजल कंठ से रोते हैं

विविध व्यथा में जीते हैं

क्षोभ से शैल दरक रहे हैं 

मनुज प्राण भी सिसक रहे हैं 

स्वार्थी बनकर मानव रहा है

प्रकृति कोष विपदा ही सहा है

निदान सही हो समाधान

रहे सुरक्षित गिरि महान.

भारती दास ✍️