शून्य रुप में पड़ी थी मिट्टी
सबकी ठोकरें खाती थी
मन मसोस कर रहती थी
बिना लक्ष्य के जीती थी.
एक कुम्हार ने आकर श्रम से
मिट्टी को खोदा और गूंथा था
फिर चाक पर खूब घुमाकर
आगों के अंदर झोंका था.
तपकर जलकर उस मिट्टी ने
अनेक रुपों में आकार लिया
मटका बनकर प्यास बुझाई
गमलों में स्वप्न साकार किया.
श्रम का मूल्य सदा मिलता है
तन का भी होता उपयोग
बेशक कष्टों से होता सामना
लेकिन सुकर्म का होता योग.
बदल स्वयं को सद्कर्म करे जो
वो सर्व हितकारी बन जाता है
अपराधी दुष्कर्मी अधर्मी
विध्वंस कारी बनकर जीता हैं.
भारती दास ✍️