पिता-पुत्री ने मिलकर साथ
कोरोना से पा लिया निजात
खुशी बहुत है हर्ष अगाध
स्वस्थ रहे बस यही है आश.
कौन श्रेष्ठ है कौन हीन है
कहर झेलती ये जमीन है
कहां सूकून है कहां चैन है
दर्द को ढोता मन बेचैन है.
अमीर होती या गरीब होती
सबको कहां नसीब होती
वो ममता जो करीब होती
मां है जिसे खुशनसीब होती.
कितनी सुंदर तब लगती है
जब स्नेहिल थपकी देती है
खुश होती है मुस्काती है
हमें प्यार भी सिखलाती है.
अनंत वेदना वह सहती है
मूक अश्क बहती रहती है
मां की गरिमा जब बढ़ती है
ये धरती भी तब हंसती है.
प्रकृति प्रदत्त मातृत्व उपहार
है अद्वितीय अनुपम सा प्यार
समस्त माताओं को आभार
उत्सव बन आया त्योहार.
भारती दास ✍️