Friday, 11 December 2015

कल्पने तू पंख पसार



कल्पने तू पंख पसार
साथ तेरे हम भी विचरें  
ख्वाबों में इक बार,
कल्पने तू पंख पसार.......
नील गगन में पिता मिलेंगे
भाई से हम बातें करेंगे
नैन हमारे छलक परेंगे
खुशियों से बेजार , कल्पने तू......
बादलों से जा मिलेंगे
बूंदे बनकर आ पड़ेंगे  
सूखे वसुधा पर गिरेंगे
भर उठेंगे दरार , कल्पने तू........
जग हंसी मेरा उड़ाये
सपने भ्रम के टूट जाये
अपने सारे रूठ जाये
गम नहीं बेकार , कल्पने तू........
आशायें रब से रखेंगे
ना निराशा से डरेंगे
व्यर्थ यूँ ही ना फिरेंगे
हर गली हर द्वार ,
कल्पने तू पंख पसार.          

Friday, 4 December 2015

चेन्नई का महा सैलाब



आसमान से बरसी आफत
जन जीवन की बनी मुसीबत
त्राहि-त्राहि का स्वर है कम्पित
कठोरता कुदरत की दर्शित
मेघ ऐसे बरस रहे थे
जैसे दुश्मन पर गरज रहे थे
सलिल रातभर बहते-बहते
प्रलय मचाया घर और रस्ते
वारिधि हुई परिधि-हीन
दिन और रात हुए गमगीन
देव हुए हैं अंधे-बहरे
क्रूर कहर के मारे थपेड़े
देख मौत का वीभत्स तांडव
पल-पल जूझ रहे हैं मानव
अपनों से अपने छूट रहे हैं
दयनीय होकर बिलख रहे हैं
परिस्थितियां वश में नहीं होती
जीवन में चुनौतियाँ ही बनती
उस जटिल क्षण का दुलार
बन जाती संजीवनी की धार
जगा रहा है ज्ञान हमारा
दुर्गम पल में मिले सहारा
उन चेहरे पर मुस्कान सजाना
उन पीड़ितों की सहायता करना
मानवता को बनाये रखना
संवेदना को जगाये रखना
प्राण डालकर जो संकट में
प्राण बचाते जो झटपट में
उन्हें दुआ है अंजुरी भरके
अरमान हो पूरे सारे उर के.
भारती दास ✍️

     

          

Friday, 20 November 2015

गांधारी की आँखों के तेज



राज घराने की वो दुलारी
थी सुन्दर सी राजकुमारी
रूपसी वो अथाह हुई थी
लेकिन अंधे से ब्याह हुई थी
अपने पति की ये लाचारी
भांप चुकी थी वो बेचारी
पति को देवता मान चुकी थी
उनका दुःख अपना चुकी थी
कहीं ये मन भटक ना जाये
उनसे कोई भूल न हो जाये
आखों पर पट्टी बांधी थी
गम उनको ना छू पायी थी
श्रेष्ठ हुए थे उनके विचार
अंधी बनना की थी स्वीकार
इस जग की मोहक छवि प्यारी
नहीं देखी कोई दृश्य मनोहारी
अहं भाव निज त्याग ना पाते
खुद सर्वस्व लुटा नहीं पाते
छिपा शेष कामना अंतर में
अनजान सी थी सायं-प्रातर में
घन-तम की चुनरी ओढ़ी थी
मायावी दुनिया से छिपी थी
धन्य हुआ था उनका जीवन
उपलब्धि थी उनका समर्पण
बंद आखों से की आराधना
सार्थक बनी उनकी प्रार्थना
तप की साधना बनी मिशाल
नेत्र की ज्योति बनी विकराल
इतनी तेज भरी नयनों में
भष्म हो जाये लोग क्षणों में
सामने आया था सुयोधन
वज्र समान बना उसका तन
विधि की लीला रची हुई थी
दुर्योधन को मौत मिली थी
गांधारी की आखों के तेज
कभी नहीं हुआ निस्तेज.