Friday, 4 September 2015

मनमोहन मुरलीधर श्याम



गरज-गरज घन बरस रहा है
चमक-चमक जाती बिजली
जन्म लिए वसुदेव के नंदन
देवकी फिर आहें भर ली।
मेढक का टर-टर सा स्वर है
गिरती है बूंदों की लड़ी
यमुना की कातिल सी लहरें
काली रातें स्याह भरी।
कपटी कुटिल कंस के डर से
वसुदेव चले गोकुल की ओर
नीरव रजनी भयानक इतनी
टूट पड़े हिम्मत की डोर।
प्रभु के दर्शन पाकर यमुना
हर्षित होकर शांत हुई
थम गयी उन्माद सी लहरें
पथ देकर आश्वस्त हुई।
लीलाधर की लीलाओं ने
सबके मन को मोह लिया
क्षण क्षण आती विपदाओं से
लड़ने का भी सोच लिया।
जीवन है कर्मों का संगम
ज्ञान में गीता सार दिया
मन के हर भावों में बसकर
सद्भावों का उपहार दिया।
प्रेम धुन वंसी में बजाकर
सौम्य रूप साकार किया
मुरलीधर के जनम का उत्सव
मन आनंद विभोर किया।  
भारती दास ✍️   

Friday, 28 August 2015

भाई से सन्देश ये कहना



अम्बर के चंदा जरा सुनना
भाई से सन्देश ये कहना
जब से गये हैं हमसे बिछड़कर
एक नजर ना देखी पलभर
उन सा कोई और कही ना....
भाई से सन्देश ये कहना
आखों से हर ख्वाब है टूटा
आश भरी हर सांस है छूटा
उनके बिना सारा घर सूना....
भाई से सन्देश ये कहना
इतने दूर गए हैं वो तो
कैसे भेजूं राखी उनको
कोई पता ना कोई ठिकाना .....
भाई से संदेश ये कहना
अम्बर के चंदा जरा सुनना.    
भारती दास ✍️ 

Friday, 14 August 2015

देश हमारा हिंदुस्तान



संघर्षों के कठिन सफर में
यातनाओं के पीड़ित प्रहार में
अश्क भरी आखों में सपने
था संजोया सेनानी अपने
रुंधे गले से गाया था गान
देश पे होना है कुर्बान.
सालों पहले हुये स्वाधीन
दशा-दिशा अब भी गमगीन
मस्तिष्क भ्रमित है विचारहीन
संघर्ष-रत है दीन हीन
विपदाओं से होकर परेशान
आहुति प्राण का दे रहे किसान.
लोभ-लालच की राहें चुनकर
आत्मघाती बन रहा निरंतर
अंतर में निष्ठुरता भरकर
जान गंवाता जानें लेकर
क्या उनका था यही अरमान
जो देश पर हो चुके बलिदान.
पवित्र-तीर्थ भूमि के समान
देश है अपना हिंदुस्तान
संस्कृति है इसकी पहचान
गीता गंगा गौ महान
आन है इसके कर्मठ किसान
शान पर इसके मिटते हैं जवान.    
भारती दास ✍️  
          

Friday, 7 August 2015

भारत है गांवों का देश



भारत है गावों का देश
हरियाली है इसकी वेश
रीति-रस्म-रिवाज विशेष
उपेक्षित कुंठित नेत्र निमेष.
बुराइयाँ हो लाखों हजार
वो होते हों भले गंवार
उर में उनके बसते है प्यार
निश्छल प्रेम करते व्यवहार.
कभी होते सूखे से बेहाल
कभी बाढ़ों से होते बदहाल
धन से भी होते तंगहाल
फिर भी जीते हैं हर हाल.
सम्पूर्ण जगत का प्राण आधार
वहां पर फसलें होती तैयार
जहाँ ना होती कोई सुधार 
जहाँ गरीबी है बेशुमार.
रफ़्तार की उस दौड़ से अनभिज्ञ है
जिस शोर से आहत हुआ मर्मज्ञ है
जन  हितैषी और विवेकी विज्ञ है
मिष्टभाषी पारदर्शी सर्वज्ञ है.
समस्या का हो निराकरण
सुन्दर सुविधा हो परिपूरण
सरल सुलभ हो आवागमन
क्यों करे फिर कोई पलायन.
गाँव बदले तो बदलेगा देश
साक्षरता में संभलेगा देश
विकासशील कहलायेगा देश
अतुल रम्य बन जायेगा देश.
भारती दास ✍️