एक ठौर से दूजे ठौरों पर
मन पंछी बन उड़ता रहता है
मलय पवन संग अनुभव लेकर
कटु जाल बुनता रहता है।
अंधकार के नीरवता में
एक दीपक जलता रहता है
अनगिनत यादें अतीत की
साया बन छलता रहता है।
विकल नेत्र में आशायें जगती
एक कोमल आलोक पसरता
निद्रा सुंदर स्वप्न दिखाती
मधुर भाव तन-मन में भरता।
नियति-नीड़ में छिपा हुआ है
कर्म किरण की पावनता
अंतर्मन को रोशन करके
अस्तित्व का दर्पण दिखलाता।
जन्मदिन का अरूणिम प्रभात
जाने क्या संदेश ले आये
शायद तृप्त हृदय को करके
अंजूरी में शुभ हर्ष दे जाये।
भारती दास ✍️
यह कविता पढ़ते हुए मन सच में एक जगह टिकता नहीं, बिल्कुल मन-पंछी की तरह। आप अंधकार, दीपक, स्मृतियों और आशा को बहुत सहज ढंग से जोड़ते हैं। मुझे यह अच्छा लगा कि आप निराशा में भी आलोक खोज लेते हैं। स्वप्न, कर्म और नियति यहाँ बोझ नहीं लगते, बल्कि जीवन को समझने के साधन बनते हैं।
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