Sunday, 30 July 2017

कवि तुम गीत लिखो कुछ ऐसा



कवि तुम गीत लिखो ऐसा
अक्षर-अक्षर मुखरित होकर
बोले प्रेम की भाषा , कवि तुम .......
कला वही सच्ची कहलाती
जिस चिंतन को चित्त अपनाती
उर-स्पंदन के जैसा , कवि तुम .......
जो झकझोरे भावुकता को
जागृत कर दे मानवता को
जो मनुज में भर दे आशा , कवि तुम .......
इंद्रधनुष सा मन हर्षा दे
युग-युग जलकर राह दिखा दे
उन दीपशिखा के जैसा , कवि तुम .........
मौन व्यथा की स्वर बन जाये
राग करुण बन नीर बहाये
दे व्याकुलता में दिलासा , कवि तुम .........
कुंठित मन को प्रेरित कर दे
नयी बोध नयी दृष्टि भर दे
भर दे नव अभिलाषा , कवि तुम .........       
 भारती दास ✍️

Saturday, 17 June 2017

उन श्रेष्ठ पिता के चरणों



देकर अपने नाम सदा ही
जिसने हमें तराशा
इक कोमल स्पर्श को पाकर
तन-मन जिसका हर्षा.
दृष्टि में कोमलता भरकर
जिसने सिखाई भाषा
देख के इक सुन्दर स्मित को
जिसने बोई आशा.
जिनके भावों के तूली से
भावुकता का प्रवाह हुआ
जिनके मौन संवेदन से
रोम-रोम आबाद हुआ.
ये देह-प्राण उर-स्पंदन
जिनके लिए है रोता
उन श्रेष्ठ पिता के चरणों में
झुकता रहेगा माथा.         
भारती दास ✍️

Saturday, 13 May 2017

माँ की महत्ता समझ में आये



पूर्ण-चन्द्र की शीतलता सी
खिले-पुष्प की कोमलता सी
मृदुल-स्नेह की विह्वलता सी
ईश की अनुपम सुन्दरता सी.
दायित्व निभाती हर पल सारे
बहाती ममता साँझ-सकारे
निर्बाध रूप सरिता सी बहकर
विघ्न अनेकों सहती अक्सर.
मूढ़-असभ्य-अशिक्षित-निर्धन
शिष्ट-शालीन या स्व-अवलंबन
नयन में अश्रु कंठ में क्रन्दन  
सुध-बुध खोती मोह में तत्क्षण.
अबोधवश या अभाव के वश
हुई भूल जो कोई बरबस
माँ की महत्ता समझ में आये
अवसान दिवस का हो ना जाये.  
        भारती दास ✍️

Monday, 8 May 2017

ठहर जाओ घड़ी भर तुम



ठहर जाओ घड़ी भर तुम
जरा ये देख ले आँखें
थे सबके प्राण से प्यारे
किये अर्पण जो तुम सांसे.
जहाँ रौनक सवेरे थी
वही अब कंज मुरझाया
हुआ सूना सा अब आँगन
तिमिर बन गोधूली रोया.
हुआ व्याकुल सा नभ का पंथ
सिहर उठा  है ये तारे   
ह्रदय में है कसक उठी
हुए गीले पलक सारे.
जीवन विषाद बनकर
कहाँ ले जायेगा कल को
प्रति-क्षण याद आओगे
कहाँ ढूढेंगे हम तुमको.
पल ये दुखद मिटकर
कभी इतिहास बन जाये
दिलों में देश के बसकर
अमर ये नाम हो जाये.       
भारती दास ✍️