Sunday, 17 December 2017

पूस की रात



कांपती हड्डियाँ ठिठुरते गात
है निर्दय सी ये पूस की रात ....
घुटनों में शीश झुका बैठे है
कातर स्वर से पुकार उठे है
न जाने कब होगी प्रभात , है निर्दय ....
लाचार बहुत मजबूर ये जान
संघर्ष में जीते हैं इन्सान
कुदरत देती है कठोर सी घात , है निर्दय ....
बर्फ सी बहती ठंढी बयार
आग की लपटें है अंगीकार
निष्प्रभ लोचन बंधे है हाथ , है निर्दय ....
सभ्यता के इस दंगल में
अंतर करना है मुश्किल में
होकर मौन जीते चुपचाप , है निर्दय ....
     भारती दास ✍️

Saturday, 25 November 2017

वो ह्रदय नहीं वो पत्थर है



वो ह्रदय नहीं वो पत्थर है
जिसमें बहती रसधार नहीं ,
जिस पुष्प में कोइ गंध नही                              
वहां भौरों की गुंजार नहीं , वो......
मुरझा जाता है, मर जाता है
 जीवन की आशा खो जाता है                         
जहाँ अपनापन का भाव नहीं
वहाँ होता सच्चा प्यार नहीं , वो......
है दरिद्र वही , है दीन वही
जिस व्यक्ति के उर में नेह नहीं
जहाँ संताप भरे आंसू बहते
वहाँ देता ख़ुशी करतार नहीं , वो .......
जो बसन्त में बस मुस्काता है
पतझर से जो घबराता है
जिस वृन्त में केवल शूल ही हो
वहाँ आता कभी बहार नहीं , वो......  
भारती दास ✍️ 

Monday, 13 November 2017

बच्चों से ही उज्जवल जग है



निर्मलता की निशानी बचपन
अल्हड़ता की कहानी बचपन
मुस्कान मधुर सुहानी बचपन
निष्कपट सी अज्ञानी बचपन.
बच्चो का होता कोमल मन
खुशियों से हँसता अंतर्मन
सरलता होती इमान-धरम
नहीं समझता पाप-पतन.
बाल-श्रमिक जीते शोषण में
मजबूर वे होते हैं जीवन में
भरके करुणा व्यथित नयन में
दर्द वे ढोते हैं जीवन में.
पूर्णतः ये बाते सच है
बचपन पर आई संकट है
उलझन में ही रहते सब है
भ्रमित वे होते भटकते पथ है.
प्यार मिले ,मिले प्रोत्साहन
हो सुन्दर पालन और पोषण
बच्चों में ही बसते रब हैं
बच्चों से ही उज्जवल जग है.   
        भारती दास ✍️

Sunday, 10 September 2017

हो श्रद्धा न हो आडम्बर



थे श्रेष्ठ सदा ही पिता हमारे
कर्तव्य निभाकर गए वो सारे
मन की व्यथा भरा नहीं था
टूट-टूटकर उर बिखरा था
भाई भी जग को छोड़ गये
अनंत पीर में डूबो गये
चीत्कार ह्रदय कर रहा निरंतर
स्मृति-हीन हुये ना पलभर
नयन-नीर बह उठता अक्सर  
समय ने दी सांत्वना बढ़कर
उॠण नहीं होगा ये जीवन
महसूस उन्हें करते हैं कण-कण
है भक्ति-भाव भरा अंतर्मन
तन-मन सारा करता वंदन
हो श्रद्धा ना हो आडम्बर
पत्र-पुष्प सुमन-दल लेकर
पार्वण-श्राद्ध करता है जो नर
पितृ-आशीष पाता जीवन-भर.     
      भारती दास ✍️