Sunday, 5 July 2015

जाना होगा सबको उस पार



लेकर दुर्लभ मानव जीवन
आशीष प्रभु का भर अंतर्मन
मानव आता ज्योति जलाने
पथ का सारा तिमिर मिटाने
करने जीवन का उपयोग
जन कल्याण का सुखद प्रयोग
पर जाते सारे प्रण भूल
कामनाएं करते हैं कबूल
अंतहीन तृष्णायें समाता
वैभव रस में कमी ना पाता
आत्मचेतना थक सा जाता
समय सदा चलता ही जाता
बचपन जाता बुढ़ापा आता
आँख-कान की व्यर्थ सी क्षमता
हाथ-पैर की सामर्थ्य-हीनता
देख विवशता रो पड़ता है
जब जाने की घड़ी होता है
सारा सत्य जागता अंतर में
जीवन के उन शेष प्रहार में
मंजिल जिसे समझकर बैठा
उन सबसे अब नाता टूटा
श्रेष्ठहीन किये कर्म धरा पर
सीख ना पाये प्रेम की आखर
अस्त-व्यस्त जीवन अपनाकर
सद्चिन्तन धर्मों को भुलाकर
सबके बीच साथ में रहकर
आये कितने क्षण और अवसर
जो क्रंदन चल रहा निरंतर
सुन नहीं पाये अंतर के स्वर
लूटता रहा वैभव मनमाना
बना रहा हरदम अनजाना
लोभ आचरण से निकालकर
मोह का आवरण उतारकर
तोड़ दर्प का अलंकार
जाना होगा सबको उस पार.      
     भारती दास ✍️

Saturday, 20 June 2015

विश्व-व्यापी योग



प्रभात काल के अरुणोदय से
नवयुग का अवतरण हुआ है
विश्व व्यापी अभियान चला है
योग दिवस पर युवा जगा है।
निरोग हो काया हो निर्मल तन  
यही अलख सब ओर सुना है
चरित्र चिन्तन को दिशा मिले
इसीलिए जन योग चुना है।
दुनिया भर के लोगों में 
खुशियों का संचार हुआ है
पुनर्जागरण की बेला में
 सहज आनंद अपार हुआ है।
ज्ञान धर्म भक्ति का संगम
योग में सारी तत्व छुपा है
नीरव मन में उठनेवाले
तूफानों का अंत हुआ है।
वैदिक युग के ऋषि-मुनि ने
योगों को अपनाया था
हो रोगमुक्त-आरोगयुक्त 
मानवता को बसाया था।
अभिलाषा के मृदु भावों से 
चित्त की चिंता दूर करें 
विश्व योग की अगवानी में
क्षीण गात को स्वस्थ करें।
चिर सौन्दर्य भरेगा तन-मन
स्फूर्ति वान बनेगा समाज
   तरुण किशोर स्वस्थ बनेगा 
बाट देखती वसुधा आज।
भारती दास ✍️

Friday, 5 June 2015

बंदा वैरागी



‘’ अपने तपे – तपाये जीवन
सधे – सधाए सुन्दर ये मन
कर दो जन समुदाय को अर्पण
नीलकंठ सा करो विष –शमन
भटक रही मनु की संतान
अंधकार में है उसकी ज्ञान ‘’
मानव पीड़ा से गला भरा था
आँखों से नीर छलक पड़ा था
गुरु गोविन्द ने दिया आदेश
सर झुका अपनाया क्लेश
बंदा ने छुपाया अपनी वेश
हित में सबकी सोची शेष
वो सारी पहचान गयी थी
बचपन की बातें तमाम गयी थी
गुरु का बंदा बन खड़ा था   
बंदा वैरागी नाम पड़ा था
बलि भूमि पंजाब का हाल
तलवार उठाई वो तत्काल
धर्मयुद्ध का आरंभ किया था
यवन शासन का अंत किया था
सतलज से यमुना एक किया
बंदा ने सरहिंद जीत लिया
पजाब को स्वाधीन किया
धर्म ध्वजा पहरा ही दिया
बलिदान हुए अनगिनत वीर
गुरुद्वारा में सजा यादों का पीर
औरंगजेव ने हमला बोला
 बंदा-वैरागी को मौत मिला
वीभत्स मृत्यु का दण्ड दिया
आनंद हंसी का बंद किया
धर्म-वीर सच्चा वैरागी
नश्वर काया को छोड़ा त्यागी
आत्मा उनकी करती पुकार
पीड़ित जनों की सुनो गुहार
             गुरु के बन्दे ना हो अनजान            
कर्तव्य-कर्म की करो पहचान.
भारती दास ✍️ 
           

Friday, 15 May 2015

नन्हा बीज संकल्पित होकर



नन्हा बीज संकल्पित होकर
आता है जब वो धरती पर
करने को सपने साकार
देने को सुदृढ़ आकार
सृष्टि को सुन्दर बनाने
सांसों में सुवास को भरने
जन-जन का मन पुलकित करने
अरमानों को सज्जित करने
वायुदेव का प्रचंड आवेग
सहता अनेक उन्माद का वेग
विनम्र हो झुकता रहा  
तृष्णाओं को पीता रहा  
बाधाओं से लड़ता रहा  
संकल्प ले बढ़ता रहा
त्याग-तप का लेकर सीख
बन गया विशाल सा वृक्ष
झुलसे तन को छाया देकर
पर-तृप्ति प्राणों में भरकर
राहगीरों के राह का डेरा
बन गया पंछियों का बसेरा
औरों की सेवा करने का
प्रण लिया मरने-मिटने का
सार्थक बनाया अपना जीवन
परोपकार ही उसका दर्पण .   
भारती दास ✍️