सर्वनाश करना बर्बरता
धर्म कभी नहीं ये सिखलाता
एक धर्म दूसरे धर्मों का
बाधक भी कभी नहीं बनता।
निर्दोषों का रक्त बहाना
निर्बल पर बल-तंत्र दिखाना
उन्मादी सा उत्पात मचाना
घात-आघात दुर्बल को देना।
दीनों की आँखें जब रोती है
कुपित हो रातें ठहर जाती है
व्याकुल सृष्टि कांप जाती है
दृष्टि दुखद बन जाग जाती है।
धर्म कल्याणमय चाह सिखाता
भक्ति की निर्मल राह दिखाता
प्रेम का आदर्श निभाता
कोमल भाव का दर्श कराता।
धीरज-धैर्य धर्म से आता
पाप-पुण्य भी कर्म से पाता
रोष-दोष सबकुछ मिट जाता
सच्चे धर्म को जो अपनाता।
भारती दास ✍️
सुंदर सृजन, फ़ॉण्ट को बड़ा करें, पढ़ने में किसी किसी को कठिनाई हो सकती है
ReplyDeleteधन्यवाद अनीता जी
Deleteशुक्रिया, शब्दाकार अब ठीक है, वाक़ई सच्चा धर्म सबके भीतर एक ही परमात्मा को देखने की सीख देता है
ReplyDeleteबहुत बहुत धन्यवाद अनीता जी
ReplyDeleteबहुत सुंदर
ReplyDeleteधन्यवाद प्रिया जी
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ReplyDeleteयह कविता आज के समय में बहुत जरूरी बात साफ़-साफ़ कहती है। आप धर्म को हिंसा से अलग रखकर उसकी असली आत्मा सामने लाते हैं। मुझे अच्छा लगा कि आप सीधे कहते हैं कि बर्बरता किसी भी हाल में धर्म नहीं सिखाती।
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