Sunday, 8 February 2015

कह रहा है खड़ा हिमालय


कह रहा है खड़ा हिमालय  
थे हम कभी मुनि का आलय
शिव-शंकर करते थे निवास
होता ऋतु वसंत का वास
प्रकृति सुंदरी उमा विचरती
लता कुसुम से सदा संवरती
गंगा-यमुना सुता हमारी
दुषित हो रही पृथा हमारी
देश का सच्चा प्रहरी बनकर
सहता रहा आघात निरंतर
लक्ष्य था क्या उद्देश्य था क्या
आज हमें कुछ नहीं पता
छिन्न-भिन्न हो गयी श्रृंखला
पाशविकता ने शस्त्र संभाला
विचर रहा है दैत्य सुबाहु
कहाँ से लाऊं राम का बाहु
देश की इस संस्कृति की शोभा
ईश ही जाने अब क्या होगा
त्याग-तप निष्ठा नहीं माने
कोई करुणा-क्षमा ना जाने
अनीति पाले सत्ताधारी
घृणा-द्वन्द रहता है जारी
रह-रहकर उन्माद जगाता
द्रोह-प्रतिशोध बैर निभाता
स्वयं भी तो दर्द भोगता
फिर भी कलुष की राहें चलता
सृष्टि का श्रृंगार मनुज है
ज्ञान का आगार मनुज है
सहज बोध हो सुन्दर सुखमय
           जग का जीवन हो मंगलमय.            

Friday, 30 January 2015

मेरी बेटी


यह अहो भाग्य है मेरा
जो बेटी का आगमन हुआ
दिल की चिर संचित आशा
ईश्वर तुमने पूरा किया .
इंतजार थी कई दिनसे
अत्यंत ख़ुशी हुई तुमसे मिलके
पूर्ण हुई अभिलाषा मेरी
अरमान और आकांक्षा मेरी .
आई है तो  दिखला देना
दुनिया को क्षमताएं अपना
क्योंकि लोग चाहते हैं केवल
बेटों के पीछे ही मरना .
क्या अंतर है बेटी-बेटा में
लहरों या धाराओं में
जिन्हें लिए चलती है सदा  
नदिया अपने आँचल में .
बेटी-बेटा तो  दोनों ही है
इस वसुंधरा के लाल
फिर क्यों लोग उन्हें देखे
अलग-अलग नजर डाल .
ऐ बेटी पूर्ण हो सपना तेरी
दुनिया की हर मंजिल हो तेरी
सफलता और सौभाग्य मिले
         दुआ हमारी पल-पल  रहे .        



Friday, 16 January 2015

तुम ना झुकना केवल कहना


ऐसी शक्ति देना हमको
कि इस पीड़ा से निकल सकूँ.
प्राणतत्व से दिग्दिगंत तक
तुझमें ही मैं बस सकूँ.
मेरे दुःख में शामिल होना
तुझसे मैं कुछ कह सकूँ.
मेरे शीश पर कर रख देना
मैं करुणा में बह सकूँ .
रो-रोकर अब तक भटकी हूँ
कब पास तुम्हारे आ सकूँ.
अब ना हो फिर विषम वेदना
कृपा तुम्हारी पा सकूँ.
मेरे भाई अब ना आयेंगे
जिसको राखी बांध सकूँ.
अपना दायाँ हाथ बढ़ाना
जिसपे आन मैं रख सकूँ.
आसूं का प्रसाद चढ़ाकर
तेरी पूजा कर सकूँ .
तुम ना झुकना केवल कहना
     इस दुर्दिन को जीत सकूँ.      
भारती दास ✍️ 

Saturday, 10 January 2015

दिल्ली तो बस दर्द ही देती




वो कोहरे का सघन अँधेरा
थर-थर कांपती तन मन सारा
ट्रैफिक का भी नियम नहीं है
लोगों को संयम नहीं है  
दुर्घटना कैसे घट जाती
किस तरह से मौतें होती
पैदल हो या हो गाड़ी पर
जानें जाती रहती अक्सर
विधि की खुद नीयत होती है
वो सदा ही बाध्य होती है
नियति के द्वारा ही बनती है
जो घटना हमपे घटती है
वर्ष तेरह ने पिता को छीना
विषम वेदना से पड़ा था जीना
चौदह में भाई मुख मोड़ा
अंतहीन दुःख में ला छोड़ा
वो माँ जो बैठी है अबतक
वापस आएगा बेटा कबतक
कष्टों में ही जीवन जीकर
उन्हें पढाया सबसे बेहतर

माता-पिता का सपना लेकर
चलते चले वो आगे बढ़कर
सबसे ऊँची पद को पाकर
झूम उठे थे ख़ुशी से भरकर
जो माँगा था सबकुछ पाया
हँसी-खुशी से घर को सजाया
किसे पता था काल की रचना
एक ही क्षण में जीवन छीना
दिल्ली की ट्रैफिक ने ले ली प्राण
मेरे भाई की अनमोल सी जान
अश्रुओं के संग में  मिलकर
बच्चों के अरमान भी बहकर
धरती में समां गए
बचपन अनाथ हो गए
पत्नी दुःख सहती रहेगी
उम्र भर रोती  रहेगी
               कार्य अधूरे छोड़कर              
बंधन सारे तोड़कर
भाई मेरे चले गए
यादों में वो बस गए  
तन अनल में जल गए
अनिल बनकर उड़ गए
पंचतत्व में मिल गए  
सोचती हूँ मै जब भी पलभर
क्यों हुआ विपरीत ये अवसर
अस्तित्व हमारे बिखर गए
सपने सारे चूर हुए
यही प्रार्थना यही है विनती
उनकी आत्मा को मिले शांति
व्यथा भरी है मेरी पंक्ति
दिल्ली तो बस दर्द ही देती .
  

                

Wednesday, 17 December 2014

नियति की विषम लेखनी


जो आनद प्राप्त कर मानव

निज सर्वस्व लुटा जाता है

पंथ-हीन राहों को चुनकर

दल-दल में ही फंस जाता है

कठिन दण्ड को पाकर भी

वही दुष्कर्म को दुहराता है

निंदा को भूषण समझकर

सहर्ष स्वीकार वो कर लेता है

अपराधों में जीने वाले

दारुण दुःख को अपनाता है

जीवन की दुखदायी चेतना

क्रूर कठोर तब बन जाता है

नियति की विषम लेखनी

मस्तक पर लिख जाता है

भाग्य प्रबल मानव निर्बल का 

क्रूर उन्माद जगा देता है

भूल ही जाता अपनी माता को

जिसके आंचल में सोता है

मानव मूल्यों की इस धरती पर

हिंसक स्वार्थ को रच देता है

विधि की रचना नोच-नोच कर

गुलजार चमन उजाड़ देता है

काँटों के पेड़ लगाने वाले

आम कहाँ वो खा पाता है

उर को छलनी करने वाले

ह्रदय वेधकर ही मरता है

पर मैंने तो ये भी सुना है

बाद में वो तो पछताता है

लेकिन वो सुनहरा पल तो

वापस कभी नहीं आता है.          

Friday, 5 December 2014

जीवन के उस पतझड़ में


जीवन के उस पतझड़ में
सपना तोड़ते पलभर में
वही लाडला बेटा अपना
जिसके लिये देखा था सपना
दिन और रात किये थे एक
इच्छा पूरी किये थे प्रत्येक
ऊँगली पकड़कर जिसे चलाया
कब जागा किस समय सुलाया
आखों से ये क्षण गुजरता
मन पीड़ा से थक सा जाता
फ़ैल रहा है ये विकृत विचार
बच्चे करते अभद्र व्यवहार
खो गयी मानव की सोच
सेवा-श्रद्धा और स्वबोध
माता पिता होते थे शान
उनसे होती थी पहचान
आज उपेक्षित कहीं खड़े हैं
रोग पीड़ा से ग्रसित पड़े हैं
भारभूत समझ कर उनको
तिरस्कार करते हैं जिसको    
वही पग-पग पर बने सहारे
गर्व से झूम उठते थे बेचारे
वृद्ध अवस्था अभिशाप नहीं है
फिर क्यों शाप सा आज हुआ है
सुपुत्र वही जो  फर्ज निभाए
माता-पिता को सम्मान दे पाये.   
   
   
  

Friday, 28 November 2014

प्रभु की लाठी



बस गंतव्य को चल पड़ी थी
भीड़ बड़ी उमड़ी हुई थी
एक बाबा थे बस में सवार
व्यक्तित्व था उनका रौबदार
एक सज्जन जो चुप बैठा था
बाबा के पहलु से सटा था
वो अचानक चीख उठा था
मै लुट गया कहकर रो पड़ा था
जेब मेरे कट गए हैं
सारे पैसे लुट  गए हैं
मेरी मेहनतभरी कमाई
बचा न अब तो एक भी पाई
कंडक्टर ने बस को रोकी
होने लगी तलाशी सबकी
बाबा के भी पास थे पैसे
क्षोभ से गर्दन थे झुके से
सिपाही ने बाबा को डांटा
लगा भी दी एक-दो चांटा
ना ही किया उम्र का लिहाज
न रखी उनकी कुछ लाज
बाबा की आँखें भर आई
इस उम्र में हुई जग हंसाई
सारे दिन की कठिन कमाई
कुछ भी मेरे काम न आई
बच्चों ने घर से निकाला
भाग्य ने इज्जत उछाला
इस दुनियां से रुखसत कर
या अल्ला इंसाफ कर
जो सज्जन पैसा ले भागा
तांगे से टकराया अभागा
घोड़े सीने पर चढ़ आया
खून से लथ-पथ हो गयी काया
उसने कहा बाबा को बुलाओ
प्लीज जरा बाबा को लाओ
हाथ जोड़कर उसने बोला
माफ़ करें मै झूठ था बोला
आपके पैसे यहीं पड़े  हैं 
खुदा ने मुझको सजा दिये हैं
मौन खड़े बाबाजी रोये
जी भरकर आंसू बरसाये
भगवान सबके साथ न होते
कमजोर बेचारे रोज ही पिटते
प्रभु की लाठी सख्त बड़ी है                  
न जाने कब किस वक्त पड़ी है.