Saturday, 11 November 2023

दीप पर्व है सहजीवन की

 दीप पर्व है सहजीवन की

एकत्व की कामना करते हैं

श्री गणेश मां लक्ष्मी की

सुभग अराधना करते हैं.

निविड़ तिमिर को चीरता दीपक

झिलमिल जगमग कर देता है

देहरी आंगन चित्त के अंदर

प्रकाश अनंत भर देता है.

उमंग उल्लास का उत्सव हो

लोग सभी यह कहते हैं

आत्मबल सदा संपन्न बने

संघर्ष सदैव ही करते हैं.

महलों को आलोकित करते

बल्ब असंख्य जलाते हैं

दयनीय दीपक कुंठित हो कर

दीनों की कुटिया सजाते हैं.

चंचल चपला मंजू मुखी मां

हर कुटीर में जाती है

निराश नयन में आशा भरकर

आशीष प्रदान कर जाती है.

अपने-अपने सामर्थ्य जुटाकर

विष्ण-प्रिया का अभिनंदन करते 

कतारबद्ध हो दीपक जलते

खुशियों की रश्मियां बिखरते.

सूने-सूने मन के अंदर

ज्योति कांति भर जाती है

उदास अधर को हर्षित करके

संदेश मुखर कर जाती है.

भारती दास ✍️

Saturday, 21 October 2023

दुर्गा प्रार्थना

 जय जग तारिणी विघ्न विनाशिनी

जय आर्या जय भवानी हे

जयति गिरजा वृषभ वाहिनी

जयति जय कल्याणी हे....

आयुध धारिणी भव भय हारिणी

जयति जय रूद्राणी हे

पुरारी भामिनी महा तपस्विनी

जयति जय शर्वाणी हे....

सती स्वरूपा जय जग मोहिनी 

जयति शुभ वर दायिनी हे

शैल नंदनी जगत वंदनी

जयति दुर्गे नमामि हे....

भारती दास ✍️



Sunday, 8 October 2023

परीक्षा(बाल-कविता)

 न हों चैन न कभी आराम

नही लेते पढने से विराम

हर-पल रहता एक ही ध्यान 

है परीक्षा उसी का नाम.

पढने के पीछे सब पड़ते 

पढो –पढो कहते ही रहते

पढने की होती नही इच्छा

देनी पड़ती है परीक्षा.

सबको आगे ही है बढना

पर सबसे इतना हो कहना

क्या होती है ऐसी शिक्षा

देनी पड़ती है परीक्षा.

आश लगी रहती है माँ की

पढने का भी बोझ है काफी

शिक्षक भी करते हैं समीक्षा

देनी पड़ती है परीक्षा.

भारती दास ✍️

Saturday, 23 September 2023

महान-विदुषी नारी कैकेयी

 

नृप दशरथ की दूसरी रानी
नाम थी कैकेयी बड़ी सयानी
थी विदुषी प्रतिभा-सम्पन्न
परम सुन्दरी वीरांगना अनुपम
सती-साध्वी चरित्र था उनका
पति-प्रेम में अटूट सा निष्ठा
राज-कार्य में करती सहयोग
नहीं रखती कुछ मन में क्षोभ
शम्बरासुर के साथ युद्ध में
दशरथ जूझ रहे थे क्रुद्ध में
तब कैकेयी ने दिखायी हिम्मत
सारथी बनकर बचाई इज्जत
राजा दशरथ थे मर्मज्ञ
एहसान मानकर हुए कृतज्ञ
हे प्रिय तुम कुछ ना सोचो
हमसे कोई दो वर मांगों
मेरा है वरदान धरोहर
मांग लूंगी कभी समय पर
यह कहकर कैकेयी मुस्काई
अपनी जीत पर वह हरषाई
अंतर कभी नहीं करती थी
राम की जननी माता सी थी
एक दूजे में था नेह समान
कैकेयी लुटाती रहती जान
दुखद आहट से थी अनजान
समय चला था कुचक्र महान
परम्परा यही चलती थी
ज्येष्ठ पुत्र को ही मिलती थी
राजा की उत्तराधिकारी
राम ही होंगे थी तैयारी
कैकेयी ख़ुशी से झूम उठी थी
पर अनहोनी कुछ और वदी थी
मंथरा नाम की थी दासी खास
जिसने लगा दी द्वेष की आग
दिल-दिमाग से तिक्त हुई थी
करुणा-ममता से रिक्त हुई थी
राजा से मांगी दो वरदान
"भरत-राज्य‘और’वन को राम"
चौदह वर्ष वनवास मिला
कैकेयी को संतोष मिला
राम-राम बस राम कहे
दशरथ जी निज प्राण तजे
इसी घटना ने मोड़ दिया
कलंक से नाता जोड़ दिया
कुमति मति की थी लाचारी
अपने पति की बनी हत्यारी
कुपथ गामिनी बनी अभागी
बनी कलंकिनी जो थी त्यागी
विधि की मोहरा वो सटीक थी
लेकिन प्रेम की वो प्रतीक थी
बन गयी वो घृणा की पात्र
बनी पापिनी मूढ़ कुपात्र
’लेकिन सत्य यही है सबसे
विदुषी महिला थी वो मन से
क्यों फिर ऐसा काम कर गयी
लोक-लाज से वो गड़ गयी
ऋषि-मुनि को सर्व विदित था
विधि की लीला स्व-रचित था
कुल के हित को चाहने वाली
राम को विजय बनाने वाली
भविष्य सुनहरा कर गयी वो
राम की प्रेरणा बन गयी वो
दूर दृष्टि कहते है इसको
जिसने कलंकित की थी खुद को
स्नेह की डोर से बांधता कौन
उत्तर से दक्षिण जाता कौन
जन-जन के मन में समाता कौन
अन्याय रावण का मिटाता कौन
जन ने मन से वहिष्कार किया
उनको सदा ही तिरस्कार किया
पेशेवर नहीं थी वो हत्यारी
नही थी अपराधी व्याभिचारी
पुत्र ने भी उन्हें बैर ही जाना
अशुभ कहा उन्हें गैर ही माना
इससे बड़ा क्या होगा दण्ड
माँ की ममता हो गयी खंड
कैकेयी की अपराध बोध
ग्लानि-नीर से बहा था क्षोभ
पछतायी वो मन से भर-कर
प्रायश्चित की उर से रोकर
पीड़ित-व्यथित-संकुचित हुई थी
आत्म-पीड़ा से दुखित हुई थी
कैकेयी की ये कथा कहती है
निश्चय शुभ सन्देश देती है
कभी किसी की बात में आकर
ना भुलाये चरित्र ये सुन्दर
खुद को पापी-पीड़ित बनाकर
क्यूँ जीना अपमानित होकर
राम ने श्रद्धा-पात्र बनाया
निर्मल और निष्पाप बनाया.
घृणित नहीं वन्दित हुई वो
निन्दित नहीं पूजित हुई वो
भरत-जननी श्रेष्ठ थी नारी
महान विदुषी दशरथ प्यारी
उन्होंने की जग पे एहसान
देकर शुभ-सुन्दर परिणाम.

भारती दास ✍️

Sunday, 17 September 2023

हे गौरी सुत हे गजबदन

 हे गौरी-सुत हे गजबदन  

एक निवेदन करते हम

झुककर भी मैं पहुँच ना पाती

जहाँ तुम्हारे दोनों चरण 

हे गौरी सुत हे गज बदन .......

मैंने सबसे यही सुना है 

दुखियों में करते विचरण 

खोज खोज के मैं हारी हूँ

कब दोगे दर्शन भगवन

हे गौरी सुत हे गज बदन..........

मेरे जीवन में क्यों होती 

क्षोभ विकलता की उन्मेष 

तेरा अपनापन पाने को

नाथ मैं सह लेती हर क्लेश 

हे गौरी सुत हे गज बदन ..........

अब देर न कर हे लम्बोदर 

अपनी करुणा बरसा मुझपर

मेरे चित-आंगन में रहना 

नमन करूँ मैं जीवन भर      

हे गौरी सुत हे गज बदन.........

Happy Ganesh chaturthi

भारती दास ✍️

Wednesday, 6 September 2023

हे कृष्ण केशव मुकुन्द माधव

 हे कृष्ण केशव मुकुन्द माधव

नंद यशोदा के सुत दुलारे

हे चक्रधारी बांके बिहारी

पतित पावन गोविन्द प्यारे

हे कृष्ण केशव मुकुन्द माधव

नंद यशोदा के सुत दुलारे....

वंशी बजैया नाग नथैया

दीन दुखी के सखा सहारे

हे कंसारी मदन मुरारी

गोवर्धन धारी तुम्हें पुकारे

हे कृष्ण केशव मुकुन्द माधव

नंद यशोदा के सुत दुलारे....

परम मनोहर अगम अगोचर

राधा वल्लभ दरश दिखा रे

ना हममें शक्ति ना भक्ति बल है

शरण में आए हैं हम तुम्हारे 

हे कृष्ण केशव मुकुन्द माधव

नंद यशोदा के सुत दुलारे....

भारती दास ✍️




Saturday, 26 August 2023

रक्षा का पर्व----रक्षाबंधन

 श्रावण शुक्ल-पूर्णिमा अतिविशिष्ट एवम महत्वपूर्ण तिथि मानी जाती है .इस दिन भाई –बहन के स्नेहिल बंधन का पर्व रक्षा –बंधन मनाया जाता है .बहन ,पावन-प्रेम से सरावोर कच्चे धागे को अपने भाई की कलाई पर बाँधती है और इसके बदले रक्षा एवम संरक्षण का वचन लेती है .

                ‘’ रक्षा –बंधन ‘’ऐसा बंधन है जो जिसे भी बांधा जाये उसकी रक्षा का संकल्प किया जाता है. किसी भी रूप में रक्षा का प्रण लेना ही रक्षा बंधन कहलाता है .रक्षा –बंधन के सन्दर्भ में कई कथाएँ प्रचलित है .

मान्यता है कि देवासुर संग्राम में सुर –असुर दोनों ही एक –दूसरे पर विजय प्राप्त करने के लिये युद्ध में विरत थे .

देवता अपने अस्तित्व एवम धर्म के लिये नीति युद्ध कर रहे थे वहीँ असुर अपने अहंकार के लिये साम्राज्य स्थापित करना चाहते थे. 

 धर्म –अधर्म का ये युद्ध कई वर्षों तक चला और अंत में असुर ही विजयी हुये.पराजय सदा ही पीड़ा,कष्ट एवम चिंता को बढाती है .इस पराजय के बाद देवताओं की स्थिति दयनीय हो गयी थी,तो इंद्राणी ने श्रावण शुक्लपूर्णिमा के दिन विधानपूर्वक रक्षासूत्र तैयार कर उसे अभिमंत्रित किया और देवगुरु वृहस्पति ने स्वस्तिवाचन के साथ इंद्रदेव के दायें हाथों में बांध दिया जिसके फलस्वरूप इंद्रदेव फिर से विजय होकर  स्वर्ग के राजा बने.उसी समय से रक्षा-बंधन का पर्व मनाया जाने लगा .

                रक्षा बंधन का ऐतिहासिक महत्त्व मेवाड़ की रानी कर्मवती से जुड़ा हुआ है. गुजरात के राजा बहादुरशाह ने मेवाड़ पर हमला कर दिया और मेवाड़ को चारों ओर से घेर लिया ऐसे संकट के समय में रानी कर्मवती ने हुमायूँ को राखी भेजी और सहायता की आशा की, हुमायूँ ने भी राखी की लाज रखी तथा रानी की हर तरह से रक्षा की.  हुमायूँ , बहादुर शाह की ही  जाति का था परन्तु उसने कुछ भी चिंता न करके एक हिन्दू बहन की रक्षा की और सम्मान दिया. इस त्योहार का धार्मिक तथा ऐतिहासिक महत्त्व सर्व –विदित है .इससे एकता का भाव प्रवाहित होता है.बहन,भाई को राखी बाँधती है व भाई हर संभव रक्षा करने की वचन देता है. लेकिन वर्तमान समय में राखी का बंधन एक प्रतीक बनकर रह गया है.अपने वचन का निर्वाह कितना कर पाता है ये तो बहनों की दुर्दशा देखकर पता चलता है. हिंसा, हत्या, छेड़-छाड़ और बलात्कार कितने ही घटनायें आये दिन होते रहते हैं. अपनी बहन की रक्षा के वचन देते हैं तथा दूसरे की बहन के साथ गंदी हरकत करते है. क्या यही संकल्प हर वर्ष लेते हैं?कितने ही ऐसे प्रश्न है जिसके उत्तर नहीं मिलते है. हमारा ह्रदय संवेदनशील है या नहीं,इसपे भी शक होता है.

         रक्षा –बंधन ,खूबसूरत व्यवसाय बन गया है .इस दिन ढेरों राखियाँ,मिठाईयां एवम अन्य उपहारों की खूब बिक्री होती है.लोग स्नेह भूल कर मुनाफा ही कमाते है.परंपरा की प्रवाह में रक्षा –बंधन बस एक पर्व रह गया है.वो उत्साह वो उमंग न जाने कहाँ खो गयी है.भाई –बहन एक दूजे के लिए समय नहीं निकाल पाते है,लेकिन इसी बहाने मिलना हो जाता है.हमारी नीरस जिन्दगी में ये त्योहार प्रेम की वर्षा करते है.यह सांस्कृतिक त्योहार विश्व –प्रेम की पुनरावृति कर जीवन में खुशियाँ प्रदान करते है. 

जीवन में सहयोग सिखाता 

सब-जन में उत्साह समाता 

प्रेम-रूप अमृत की वर्षा 

सावन की सौगात है अच्छा.

भारती दास ✍️

Monday, 14 August 2023

हे भारत के संतान श्रेष्ठ

कुछ अनुभूति अंकुरित हुई है 

नव स्फूर्ति विस्तरित हुई है

हे शुभ प्रभात के बाल-श्रेष्ठ

महसूस करो क्या विदित हुई है।

शुभ कर्म करो ना शर्म करो 

संकल्प करो ना विकल्प धरो 

हे लोकहित कल्याण-श्रेष्ठ 

कर्णधार बनो ना प्रहार करो।

बहुत सो चुके बहुत खो चुके 

अब देर करो ना बहुत रो चुके 

हे चेतना के ज्ञान-श्रेष्ठ 

फिर निजता में ही क्यों सिमट चुके।

यों डरते रुकते ठहरों ना 

आगे बढ़कर अब सोचो ना 

हे नव जीवन के प्राण-श्रेष्ठ

बनो समर्थ यूँ ही भटको ना।

अपने अन्दर चिंगारी भर लो 

जोश उमंग बस सारी भर लो

हे शक्तिवान बलवान-श्रेष्ठ 

प्रचंड वेग हितकारी भर लो।

प्रभु की शक्ति साथ खड़ी है 

आशीष की बारिश बरस रही है 

हे भारत के संतान-श्रेष्ठ

समय की धारा बीत रही है।

भारती दास ✍️

Saturday, 29 July 2023

हूं अंतिम अरुण क्षितिज का

 एक पिता ने कहा खेद से

विषम बहुत है सूनापन

नीरव-नीरव वृद्ध नयन यह

खोज रहा है अपनापन.

भूल गया क्या, याद है कुछ भी

था तेरा भोला सा बचपन

नेह वही पाने को मचलता

बूढ़ा सा ये तन-मन हरदम.

भार वेदना का ढोया था

जब नन्हें थे तेरे कदम

तड़प-तड़प से मैं जाता था

जब बहता तेरा अश्रु-कण.

चिर आकांक्षा निष्फल इच्छा

अथाह असीम है व्याकुलतापन

अवसाद अनंत है अकथ विषाद है

व्यर्थ विफल है एकाकीपन.

हूं अंतिम अरुण क्षितिज का

आलोक हीन वैभव विहीन 

विकल दिवाकर डूबता जैसे

मुख मलिन अनुराग हीन.

भारती दास ✍️

Saturday, 22 July 2023

फिर-फिर घिर-घिर जाती नारी

 

फिर-फिर घिर-घिर जाती नारी

रक्त बहाती जाती बेचारी

तृषित कंठ में विष का प्याला

प्राण गंवाती जाती नारी

फिर-फिर घिर-घिर जाती नारी....

आंसू से भीगे आंचल में

विप्लव भर लेती हरपल में

शापित जैसा जीवन लेकर

अपराधी सी जीती नारी

फिर-फिर घिर-घिर जाती नारी....

कब हंसती कब रो लेती है

क्या पाती क्या खो देती है

बस आहुति देती रहती

निर्मल पावन मन की हारी

फिर-फिर घिर-घिर जाती नारी....

व्यथा भार संताप को ढोती

निशि-वासर पीड़ा में होती

घायल तन-मन करता रहता

अधम नीच और दुराचारी

फिर-फिर घिर-घिर जाती नारी....

भारती दास ✍️