Wednesday, 7 March 2018

वार्षिक उत्सव आज मनाया



महीने भर का था परिश्रम
परिवेश सुखद बन आया
हर्ष-उल्लास-उमंग से भरकर
वार्षिक उत्सव आज मनाया.
न्योछावर था कण-कण में आशा
था अर्पण हिय की अभिलाषा
प्रति-पल प्रेम ह्रदय का छलका
नाच रही थी लहर-लहर में
इक आनंद की माया,
वार्षिक उत्सव आज मनाया.
अहंकार निज तज बैठे थे
स्नेह-मिलन में रंग बैठे थे
अभिनव पुलकित भाव उठे थे
इन बचपन के मृदु-गुंजन से
सीख अनूठी पाया,
वार्षिक उत्सव आज मनाया.
उन्मुक्त हँसी शोभित अधर
चंचल-कोमल रूप प्रखर
मीठे-मीठे मोहक सा स्वर
ख़ुशी में डूबा था ये अवसर
उर में अनुराग समाया,
वार्षिक उत्सव आज मनाया.  
भारती दास ✍️    

Wednesday, 31 January 2018

वो बेटी है



जीवन में भरती नव-नव मोद
खेलती-कूदती करती विनोद
जो मनुहार में जीती है , वो बेटी है
जो रुद्ध कंठ से रोती है
झकझोर ह्रदय को करती है
जो पलकों पर सावन रखती है , वो बेटी है
पल-पल विकलित क्षण-क्षण विचलित
शिशु सौरभ सा स्मित पुलकित
जो शशि छूने को मचलती है , वो बेटी है
कोमल-कोमल अंग-राग
अरुण नयन में भरे अनुराग
जो दीपशिखा सी जलती है , वो बेटी है
सुख में दुःख में अंधकार में
वाणी से शोभित संस्कार में
जो प्रेम की धारा बहाती है , वो बेटी है    
  भारती दास ✍️

Sunday, 31 December 2017

चिर वन्दित है ये नव प्रभात



नयी सी लगती आज ये ऊषा
नया-नया लगता है विहान
मन प्राण हुए हैं पुलकित
हर्षित है ये दिशा तमाम .
शब्द सभी निःशब्द हो गये
देख धरा का रूप सुहाना
अरुणोदय की अरुणिम आभा
बरसाता वैभव मनमाना .
कलियों का मुख था मूर्छित
स्वर्ण किरण से सीखा हँसना
मृदु अधरों पर मंद हास से
गुंजित है मधुकर का गाना .
नवमय वसुधा के आँगन में
नव शैशव है आलोड़ित
अभिनंदित नव संध्या में
नवल शशि है मनमोहित .
रच-रच रूप नवीन निरुपम
मलय प्रणय करते चुपचाप
कितना सुन्दर कितना मनोरम
है चिर वन्दित ये नव प्रभात . 
भारती दास ✍️

Sunday, 24 December 2017

जिनके लिए दृग बह निकला है



वक्त ने मुझपर किया भला है
दर्द पर मरहम लगा चला है
नये जोश नई उर्जा लेकर
विवश-विकल दिल फिर संभला है ....
मृदुल तरु की टहनी जैसी
स्वप्न सजाई थी मै वैसी
क्रूर काल के पंजों ने तो
नयनों से सपने तोड़ चला है .....
लम्हें मौन के धीर बंधाये
कुछ अनुभव ने हमें सिखाये
रस्म यही है , रीत यही है
आदि-अंत में जग ये ढला है .....
अब काली रजनी नहीं डराती
अश्क व्यथा पर नहीं बहाती
विधि ने चाहा वही हुआ है
नहीं किसी से कोई गिला है ....
दुःख-सुख के धागों को लपेटे
यादों को पल-पल में समेटे
पदचिन्ह अमिट होते हैं उनके  
जिनके लिये दृग बह निकला है ....  
भारती दास ✍️ 

भाईजी की तीसरी बरसी पर वेदनापूर्ण श्रद्धांजली