Sunday, 15 November 2015

छठ पर्व की उपासना



शुक्ल पक्ष की तिथि षष्ठी
कार्तिक का पवित्र महिना
साधना करते साधक गण
सविता की करके उपासना.
रोग-मुक्त हो पुत्र प्राप्त हो
दीर्घायु की अटल कामना
छठ की पूजा मन से करते
रखते अनंत भक्ति की भावना.
सूरज से वर्षा होती है
वर्षा से अन्न की उत्पन्न
अनगिनत प्राणियों का फिर  
पृथ्वी पर होता पोषण.
बांस के सूप मिट्टी के बर्तन
चावल गुड़ से बना प्रसाद
सुमधुर गीतों की ध्वनि से
छठ पूजा की मीठी सुवास.
रीति रिवाज के उन रंगों में
उपासना का है अपना ढंग
न विशेष धन की जरुरत
न पुरोहित शास्त्र का संग.
अर्ध्य दान और भावदान की
है इसकी कुछ खास महत्व  
अपने अपने सामर्थ्यों से
पूजा करते श्रद्धा-वत.
कामनापूर्ति छठ की पूजा
जो करते हैं सदा निरंतर
मनवांछित फल सहज ही पाते
सूर्य षष्ठी के शुभ अवसर पर.               

Tuesday, 10 November 2015

चेतना का उद्घोष है दीपक



निज संस्कृति में बसी दीवाली
खुशियों की है प्रतीक दीवाली
सुन्दर सुखमय दीपों की अवली
रोशन करती घर और देहली
स्नेह के तेल में भीगती है बाती
दीपमालिका दिखती है अनूठी
निष्ठुरता को त्यागकर
आत्मज्योति को दीप्तकर
निर्जन रजनी को हरषाने
कोने-कोने का तिमिर मिटाने
जीवन पथ आलोकित करने
अंतर्मन को प्रकाशित करने
तिल-तिल कर हरपल जलता है
औरों को रोशन करता है
चेतना का उद्घोष है दीपक
संघर्षों का जोश है दीपक
जज्बातों की आश है दीपक
निराश मन की प्रकाश है दीपक.

HAPPY DIWALI     

Thursday, 5 November 2015

सहसा वो विलीन हो जाते



दिन ढलने को हो आया था
घर अपने सब लौट आया था
थी गोधूली की अद्भुत वेला
हुआ प्रकाश का मंद उजाला
थे बरगद के पुराने-झाड़
पशु-पक्षी बैठे थे अपार
बोली मैना आनंदित होकर
आज बड़े प्यारे थे दिनकर
सूर्योदय था कितना मनोरम
जैसे दूर हुए थे सब गम
विस्मित हो बोला चमगादड़
कौन से सूर्य कैसे हैं दिनकर
उसे प्रकाश का भान नहीं था
दिन और रात का ज्ञान नहीं था
मैना बड़ी हैरान हुई
उसकी बुद्धि से परेशान हुई
विधि ने दिन और रात बनाई
उसे प्रकृति की बात बताई
दिन में हम करते हैं काम
रातों को करते हैं विश्राम  
चमगादड़ कुछ समझ न पाया
खुद को वो उलझन में पाया
साधू एक बैठे थे मौन
सुनकर उनका दृष्टिकोण
मैना को समाझाकर बोले
चमगादड़ ना देखे उजाले  
वो सदा अंधकार में जीता
प्रकाश से उसको रहा न नाता
उसने बस रातों को देखा
दिन क्या है कभी न समझा
वो नहीं जानता क्या है सृष्टि
जीवन की कैसी हो दृष्टि
कुछ मनुष्य ऐसे ही होते
संकुचित होकर जीवन जीते
ज्ञानप्रकाश से वंचित होते
बातों से आहत कर देते
पंथहीन राहों को चुनते
फिर सहसा विलीन हो जाते.      
         भारती दास ✍️

Friday, 30 October 2015

इन्दिरा प्रियदर्शिनी



माता-पिता की वो लाडली थी
बचपन में नाजों से पली थी
विरासत में राजनीति मिली थी
स्वभाव से वो बड़ी भली थी.
विघ्नों की दौर आन पड़ी थी
दादा-पिता पर कहर पड़ी थी
क्रांतिकारियों की लहर बड़ी थी
देश-प्रेम की भाव भरी थी.
सदभावना की आधार थी वो
अदम्य साहसी अपार थी वो
सुनती नहीं ललकार थी वो
मर मिटने को तैयार थी वो.
उनकी गुणों की ना तोल थी
वो नारी रत्न अनमोल थी
वो निर्भयता की मिशाल थी
दृढ़ता उनकी वेमिशाल थी.
बाधाओं ना डिगा सकी थी
अवरोधों ना मिटा सकी थी
दर्द-विषाद अनेक सही थी
विश्व-क्षितिज पर वो उभरी थी.
व्यक्तित्व कहाँ है ऐसी क्षमता
जिसमें हो करुणा मानवता
ह्रदय में जिसकी हो राष्ट्रीयता
राष्ट्रप्रेम की हो व्याकुलता.
प्रियदर्शिनी इन्दिरा कहलायी
उनसे प्रेरणा सबने पायी
राष्ट्र पर अपनी जान लुटायी
रक्त का कतरा-कतरा बहायी.
राजनीति को नये आयाम
दिया शक्ति के रूप तमाम
अंग रक्षक ने ले ली जान
इन्दिरा कोटि कोटि प्रणाम. 
भारती दास ✍️