धूम मची है झूम
उठी है,
धरती गगन सितारे
भी .
धर्म का रथ सज-धज
कर निकला ,
अपने नन्द दुलारे
की .
बलदाऊ के संग में
बैठी,
बहन सुभद्रा
प्यारी भी,
हर्षित जन है
पुलकित मन है,
बीती रात
अंधियारी की .
मंद-मंद होठों पर
हंसी है,
जैसे खिलती
कुसुम-कली की .
एक झलक पा लेने
भर की,
नयन झांकती गली-गली
की .
स्वागत करने को
है आतुर,
प्रकृति कृष्ण
मुरारी की .
भक्तों के दुःख
हरनेवाले,
गोवर्धन गिरधारी
की .
नभ से सुमन बरसता
जैसे,
वैसी बरस रही है
फुहार .
धरती का मुख चूम-चूम
कर,
बह रही शीतल ये
बयार .
श्रद्धा-भरी ऐसा
ये क्षण है,
पुलक-भरी भक्ति
सबकी .
आस्था में इतनी
शक्ति है,
प्यास बुझी है
दृष्टि की .
देश की पावन माटी
अपनी,
जिसकी संस्कृति
है अपार .
जन-जन में उत्साह
जगाने,
रथ निकला है अबकी बार .