Friday, 17 July 2015

रथ निकला नन्द दुलारे की



धूम मची है झूम उठी है,
धरती गगन सितारे भी .
धर्म का  रथ सज-धज कर निकला ,
अपने नन्द दुलारे की .
बलदाऊ के संग में बैठी,
बहन सुभद्रा प्यारी भी,
हर्षित जन है पुलकित मन है,
बीती रात अंधियारी की .
मंद-मंद होठों पर हंसी है,
जैसे खिलती कुसुम-कली की .
एक झलक पा लेने भर की,
नयन झांकती गली-गली की .
स्वागत करने को है आतुर,
प्रकृति कृष्ण मुरारी की .
भक्तों के दुःख हरनेवाले,
गोवर्धन गिरधारी की .
नभ से सुमन बरसता जैसे,
वैसी बरस रही है फुहार .
धरती का मुख चूम-चूम कर,
बह रही शीतल ये बयार .
श्रद्धा-भरी ऐसा  ये क्षण है,
पुलक-भरी भक्ति सबकी .
आस्था में इतनी शक्ति है,
प्यास बुझी है दृष्टि की .
देश की पावन माटी अपनी,
जिसकी संस्कृति है अपार .
जन-जन में उत्साह जगाने,
रथ निकला  है अबकी बार .               

Friday, 10 July 2015

वाणी ही जीवन सार है



वाणी इक विचार है, वाणी है व्यवहार
वाणी धैर्य अपार है ,वाणी से संसार .
वाणी ही तो पुकार है ,वाणी ही है गुहार
वाणी से ही प्रीत है ,वाणी से मनुहार .
वाणी से इकरार है ,वाणी से तकरार
वाणी से ही मीत है, वाणी से ही प्यार .
वाणी इक आधार है ,वाणी इक अधिकार
वाणी ही से रीत है, वाणी से परिवार .
वाणी ठंडी बयार है ,वाणी सुखी बहार
वाणी उर में करती है, प्राणों का संचार .
वाणी ही संवेदना ,वाणी ही सद्भावना
वाणी ही करुणा भरी, वाणी ही है प्रार्थना .
वाणी से परिहास है, वाणी से उपहास
वाणी ही एहसास है ,वाणी से ही आस .
वाणी रूप उद्गार है , वाणी ही उपहार
वाणी से ही जीत है, वाणी ही जीवन सार.     

भारती दास ✍️ 

Sunday, 5 July 2015

जाना होगा सबको उस पार



लेकर दुर्लभ मानव जीवन
आशीष प्रभु का भर अंतर्मन
मानव आता ज्योति जलाने
पथ का सारा तिमिर मिटाने
करने जीवन का उपयोग
जन कल्याण का सुखद प्रयोग
पर जाते सारे प्रण भूल
कामनाएं करते हैं कबूल
अंतहीन तृष्णायें समाता
वैभव रस में कमी ना पाता
आत्मचेतना थक सा जाता
समय सदा चलता ही जाता
बचपन जाता बुढ़ापा आता
आँख-कान की व्यर्थ सी क्षमता
हाथ-पैर की सामर्थ्य-हीनता
देख विवशता रो पड़ता है
जब जाने की घड़ी होता है
सारा सत्य जागता अंतर में
जीवन के उन शेष प्रहार में
मंजिल जिसे समझकर बैठा
उन सबसे अब नाता टूटा
श्रेष्ठहीन किये कर्म धरा पर
सीख ना पाये प्रेम की आखर
अस्त-व्यस्त जीवन अपनाकर
सद्चिन्तन धर्मों को भुलाकर
सबके बीच साथ में रहकर
आये कितने क्षण और अवसर
जो क्रंदन चल रहा निरंतर
सुन नहीं पाये अंतर के स्वर
लूटता रहा वैभव मनमाना
बना रहा हरदम अनजाना
लोभ आचरण से निकालकर
मोह का आवरण उतारकर
तोड़ दर्प का अलंकार
जाना होगा सबको उस पार.      
     भारती दास ✍️

Saturday, 20 June 2015

विश्व-व्यापी योग



प्रभात काल के अरुणोदय से
नवयुग का अवतरण हुआ है
विश्व व्यापी अभियान चला है
योग दिवस पर युवा जगा है।
निरोग हो काया हो निर्मल तन  
यही अलख सब ओर सुना है
चरित्र चिन्तन को दिशा मिले
इसीलिए जन योग चुना है।
दुनिया भर के लोगों में 
खुशियों का संचार हुआ है
पुनर्जागरण की बेला में
 सहज आनंद अपार हुआ है।
ज्ञान धर्म भक्ति का संगम
योग में सारी तत्व छुपा है
नीरव मन में उठनेवाले
तूफानों का अंत हुआ है।
वैदिक युग के ऋषि-मुनि ने
योगों को अपनाया था
हो रोगमुक्त-आरोगयुक्त 
मानवता को बसाया था।
अभिलाषा के मृदु भावों से 
चित्त की चिंता दूर करें 
विश्व योग की अगवानी में
क्षीण गात को स्वस्थ करें
चिर सौन्दर्य भरेगा तन-मन
स्फूर्ति वान बनेगा समाज
   तरुण किशोर स्वस्थ बनेगा 
बाट देखती वसुधा आज।
भारती दास ✍️