Thursday, 16 October 2014

जागो युग सेनानी



युग का मुर्गा बांग दे रहा
जागो युग सेनानी .
नये वेश में करनी है
भारत की अगवानी .
दमकेगा अब गाँव-गाँव में
स्वच्छता भरी जवानी .
मिल-जुल कर हर कार्य करे
करे ना अब  मनमानी .
सृजन की लहरे मारे हिलोरे
नव निर्माण है आनी.
लोक शिक्षक बनकर उभरे
नव यौवन मस्तानी .
कार्य अधूरे जो बाकी है
पूरे मन से करेंगे .
आत्म निर्भर हम बनेंगे
श्रम स्वीकार करेंगे .
गरीब बनकर जीना सीखे
कंगाली ना घेरे .
योग्यता बढती ही जाये
काबिल बनकर उभरे .
सपने हो या बने हकीकत
नव चितन तो आये .
हम सबका कर्तव्य यही है
हाथ से हाथ मिलाये .
इसी सोच पर अब टिका है
पहले अपना करे सुधार.
युग आमंत्रण कर रहा है
सुने सदा इसकी पुकार .   
     

Friday, 3 October 2014

निर्बल के बल राम



 एक टिटहरी जूझ रही थी
चोंच में रेत को भर रही थी
सुबह से आखिर शाम हुई थी
संकल्प में ना कमी हुई थी
समुद्र ने तो चुटकी ली
क्यों प्राण गंवाने पर हो तुली
तुम मुझे क्या भर पाओगी
विशाल जल सूखा पाओगी
नादान दुर्बल थी टिटहरी
अधिकार पाने पर थी अड़ी
करती रही अनुनय विनय
हे समुद्र देव हैं आप सदय
ये अंडे है मेरे धरोहर
मेरे जीवन-मूल्य से बढ़कर
मेरा सुन्दर होगा परिवार
बच्चों से सजेगा घर-संसार
इसके बिना ना जी पाऊँगी
जीते जी मैं मर जाऊँगी
रो-रो करती रही गुहार
फिर भी समुद्र न सुनी पुकार
जो दुर्बल है जो निर्बल है
उसके साथ भगवान का बल है
महर्षि अगस्त आ गए वहां
न जाने वे थे कहाँ
उन्होंने वो सबकुछ देखा था  
समुद्र ने जो कहा सुना था  
करुणा से भर उठे मुनि
दया द्रवित हो उठे मुनि
समुद्र के दिल को झकझोरा
हर पहलू को मन से जोड़ा
फिर भी समुद्र ने किया इनकार
अहंकार में डूबा बेकार
मुनि अगस्त ने इक पल सोचा
अंजुरी में वारिधि को समेटा
बोले तुम हो महा-विशाल
तो मेरे तप भी है विकराल
मेरे लिए तुम हो चुल्लू-भर
पर करता रहा मैं सेवा निरंतर
दुर्बलों को दिया सहारा
मुश्किलों से सदा उबारा
समुद्र ने अस्तित्व गंवाया
जन कल्याण की कसमें खाया
टिटहरी ने अंडे को पाया
मुनि चरणों में शीश नवाया
मिली प्रसन्नता ख़ुशी तमाम
               गाती रही निर्बल के राम .             

Friday, 26 September 2014

आई माता शेरावाली


शरद ऋतू की सुन्दर वेला
मनभावन मौसम अनुकूला
प्रकृति की ये छटा निखरती
मीठी मीठी हवा बिखरती
खुशियाँ हरपल छाई रहती
उमंग तरंग समायी रहती
नौ दिनों तक पूजन होती
माँ दुर्गे की अर्चन होती
आई माता शेरावाली
बाधा व्यथा मिटानेवाली
महिषासुर को मारनेवाली
राम को विजय दिलानेवाली
दयामयी अम्बे की जय हो
पथ दिखाओ अब न भय हो
रोम रोम से करूँ पुकार
     निज बाँहों को दो ना पसार. 
भारती दास ✍️ 

Saturday, 6 September 2014

गया में क्यों होता पिंडदान



पौराणिक कथा आख्यान
देते सदा ही सुन्दर ज्ञान
क्या कहते हैं शास्त्र पुराण
क्यों विश्वगुरु है भारत का ज्ञान
गया में क्यों होता पिंडदान
क्यों है इसका महत्व विधान
पितरों को यहाँ मिलती मुक्ति
हर जन की यही है अभिव्यक्ति
गया नाम का एक असुर था
भक्तों में वो श्रेष्ठ प्रवर था
उसमें केवल भक्ति निहित था
वो जिद्दी और हठी बहुत था
जप-तप से था उसका लगाव
विष्णु से था सख्य का भाव
दैत्यगुरु ने बहुत समझाया
दैत्यों का नहीं ये मार्ग बताया
असुर सदा करते उत्पात
नहीं करते भक्ति की बात
गयासुर ने बात न मानी
भक्ति को ही जीवन मानी
भक्ति ऐसी कि स्वर्ग हिला था
देवों के तो गर्व हिला था
सारे देव दुखी व्यथित थे
दैत्यों से भयभीत अधिक थे
इंद्र ने की षड़यंत्र की रचना
देव गुरु से कर के मंत्रणा
सृष्टि का कल्याण सुखद हो
इसके लिए एक विशद यज्ञ हो
इस यज्ञ की है यही विशेषता
ये धरती पर नहीं हो सकता
देवगुरु ने किया निवेदन
हे गयासुर तुम दो अपना तन
तुममें भरा है धैर्य प्रचुर
भक्त श्रेष्ठ तुम हो असुर
मेरी विनती करो स्वीकार
तुम करो तन का विस्तार
हे देवराज - हे देवगुरु
आप करे बस यज्ञ शुरू
सब जीवों का हो कल्याण
शीघ्र करें यज्ञ का निर्माण
गयासुर ने तन फैलाया
विस्तृत कर विस्तार बनाया
यज्ञ-ध्वनि  लगा गूंजने
यज्ञाग्नि से तन लगा टूटने
भीषण पीड़ा से जला शरीर
दीर्घ काल तक चला ये पीर
वो शरीर जो देव निमित था
उसपर भक्त की छाप अमिट था
यज्ञ समाप्त होने को आया
वो भी मृत होने को आया
पूरी हुई देवों की इच्छा
गयासुर की भक्ति परीक्षा
गयासुर--- देवों ने कहा
वर मांगों तुम मनचाहा
हे नाथ मुझे मुक्ति मिले
आपकी बस भक्ति मिले
हम पर कर दे इतनी कृपा
जहाँ तक है ये देह मेरा
वहां सदा हो श्रद्धा भक्ति
पितरों को मिले हरदम मुक्ति
देवों ने कहा –तुम हो महान
पितर देव  गाये गुणगान
तेरे देह वाले स्थान
कहलायेंगे गया का धाम
युगों युगों तक होगा सिद्ध
गया नाम से होगा प्रसिद्द
पिंड का दान करे जो पुत्र
उनके पितर होंगे ही मुक्त 
   अपने अराध्य में होकर लीन    
       भक्त और भक्ति हुई विलीन .      

भारती दास ✍️