देवासुर के महा-संग्राम में
आसुरी शक्ति बढ़ी हुई थी
देवगण सारे हताश हुए थे
विजय की कोई आश नहीं थी।
दानव सेनापति था वृत्रासुर
था उसका आतंक बहुत
देवताओं की पराजय पर
दैत्यों में था हर्ष बहुत।
उसकी असीम शक्ति देखकर
देवराज अति भयभीत हुए
संग सभी देवों को लेकर
ब्रह्मा जी के पास गए।
साधारण अस्त्रों-शस्त्रों से
उसका वध नहीं हो सकता
उसके क्रूर अत्याचारों से
रक्षा करें हे परमपिता।
परोपकारी महान त्यागी
शिवभक्त दयालु हैं दधीचि
विश्व के कल्याण हेतु वे
उत्सर्ग करेंगे अपनी अस्थि।
प्रजापति ने कहा - देवों से
ऋषि दधीचि के शरण में जाएँ
राक्षसों के विनाश के लिए
अस्थि दान दें उन्हें बताएँ।
हाथ जोड़ नतमस्तक हो
शचीपति ने नमन किया
देवहित याचक बनकर वे
महर्षि-आश्रम को गमन किया।
रोम-रोम खिल उठा ऋषि का
जब इन्द्र ने अस्थि की याचना की
योगबल से निज प्राण तजकर
युद्ध में जीत की कामना की।
ऋषिवर दधीचि के त्यागों को
देवताओं ने वंदन किया
जीवन दायिनी दु:सह कार्य को
सजल नयन से ग्रहण किया।
भीषण भयानक रण सागर में
वृत्रासुर का बल चरम था
अट्टहास कर गर्जन करता
पावक-ज्वाला सा कोप अगम था।
महाऋषि के सख्त हाड़ों से
देवेंद्र ने वज्र का निर्माण किया
उसी दिव्य वज्रास्त्र से ही
वृत्रासुर का प्राण गया।
देवासुर के समरांगन में
देवगणों की जीत हुई
स्वर्ग के राजा बने पुरन्दर
सुरपुर की रीत पुनीत हुई।
श्रेष्ठ ऋषियों के कारण ही
गर्वित है भारत का मस्तक
परोपकार के लिए सदा ही
प्राण-दान किये हैं अब-तक।
भारती दास ✍️
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