Thursday, 11 June 2026

उद्देश्य सफल हो जाता है

 

आनंद स्त्रोत बह रहा निरंतर

क्यों उदास होता है ये मन 

चिर नवीन ये चिर पुराण है

अमृतमय सा सुख स्पंदन।

प्रकृति करती है परिवर्तन

विचलित होता जड़ व चेतन 

नभ में उड़ते विहग ये कहते

जीवन एक संग्राम है हर क्षण।

क्यों हताश होता है ये मन

क्यों निराशा देती है मार 

है शिथिलता कैसा मन में

क्यों जीवन लगता बेकार।

जग के निर्मम कोलाहल में

शांति डूबी जाती  है 

विषमता के इस फैशन में

स्व-ज्योति बुझी जाती है।

देशभक्ति का ढोंग है भारी

कर्त्तव्य भाव भी सच्ची नहीं

सेवा-शिष्टाचार नहीं तो

निर्ममता भी अच्छी नहीं।

कितनी रातें बीती सिसकती

कितने आँसू बहाते हम

कहाँ से आये कहाँ है जाना

सोचकर यह घबराते हम।

वायु का सुन्दरतम झोंका

सुखद स्पर्श कर जाता है 

पुष्प नये खिलते डाली पर

पल अगले ही मुरझा जाता है।

नूतन चोला धारण करके

जीवन यात्रा निकल जाता है 

प्रभु चरणों में नतमस्तक हो

उद्देश्य सफल हो जाता है। 

भारती दास ✍️

1 comment:

  1. सुंदर सृजन, आनंद के उस स्रोत का ही आश्रय लेना होगा, जीवन तो ऐसे ही चलता जाएगा

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