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Saturday, 13 May 2017

माँ की महत्ता समझ में आये



पूर्ण-चन्द्र की शीतलता सी
खिले-पुष्प की कोमलता सी
मृदुल-स्नेह की विह्वलता सी
ईश की अनुपम सुन्दरता सी.
दायित्व निभाती हर पल सारे
बहाती ममता साँझ-सकारे
निर्बाध रूप सरिता सी बहकर
विघ्न अनेकों सहती अक्सर.
मूढ़-असभ्य-अशिक्षित-निर्धन
शिष्ट-शालीन या स्व-अवलंबन
नयन में अश्रु कंठ में क्रन्दन  
सुध-बुध खोती मोह में तत्क्षण.
अबोधवश या अभाव के वश
हुई भूल जो कोई बरबस
माँ की महत्ता समझ में आये
अवसान दिवस का हो ना जाये.  
        

Monday, 8 May 2017

ठहर जाओ घड़ी भर तुम



ठहर जाओ घड़ी भर तुम
जरा ये देख ले आँखें
थे सबके प्राण से प्यारे
किये अर्पण जो तुम सांसे.
जहाँ रौनक सवेरे थी
वही अब कंज मुरझाया
हुआ सूना सा अब आँगन
तिमिर बन गोधूली रोया.
हुआ व्याकुल सा नभ का पंथ
सिहर उठा  है ये तारे   
ह्रदय में है कसक उठी
हुए गीले पलक सारे.
जीवन विषाद बनकर
कहाँ ले जायेगा कल को
प्रति-क्षण याद आओगे
कहाँ ढूढेंगे हम तुमको.
पल ये दुखद मिटकर
कभी इतिहास बन जाये
दिलों में देश के बसकर
अमर ये नाम हो जाये.            

Sunday, 30 April 2017

श्रमेव जयते



प्रथम किरण जब भू को छूती
जब विहग-बालिके करती शोर
मौन होकर श्रमिक निकलते
कार्य वे करते भाव-विभोर.
जेठ की तपती धूप वे सहते
बारिश के सहते बौछार
अनासक्त होकर श्रम करते
हो क्षुधा-पीड़ित चाहे बेजार.
साधनहीन है गांव आज भी
अभावग्रस्त है ढेरों किसान
ग्राम उजड़ते जाते हैं पर
नगरों का करते उत्थान.
बंजर-भूमि को तोड़ते रहते
अथक परिश्रम करते पुरजोर
श्रमिक-श्रम करते ही रहते
अनवरत पत्थर को तोड़.
तब व्यर्थ है पूजन-भजन
व्यर्थ है ईश की आराधना
श्रमेव की जय हो वहां पर
जहाँ श्रमिक करते हैं साधना.               

Sunday, 19 March 2017

चाँद फिर झांका खिड़की से



चाँद फिर झांका खिड़की से
विहंस उठा मेरी झिड़की से
चाँद फिर झांका खिड़की से....
चुपके चुपके दबे पांव से
वो आता हर शहर गांव से
मन को मोहता दुग्ध-हंसी से
चाँद फिर झांका खिड़की से....
दुःख के साथी सुख के साथी
कहता हम हैं सच्चा साथी
कह डालो हर बात ख़ुशी से
चाँद फिर झांका खिड़की से....
वो बढ़ता है वो घटता है
पथ पर यूँ चलते रहता है
उसे बैर ना क्लेश किसी से
चाँद फिर झांका खिड़की से....
दूर गगन में वो रहता है
कही-अनकही सब सुनता है
कुछ समझाता वो चुप्पी से
चाँद फिर झांका खिरकी से....