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Sunday, 29 April 2018

विषैले बेल की तरह


विषैले बेल की तरह 
फैलता ही जा रहा है  
निर्दोष-नौजवानों का
रक्त पीता जा रहा है.
अन्याय का अपकर्ष का
विद्रोह का विध्वंस का
प्रतिशोध से अनगिनत ही
दंश देता जा रहा है.
ईर्ष्या-द्वेष हाहाकार है
विवश-विकल चीत्कार है
प्रतिभावान छात्र तो
व्यंग्य बनता जा रहा है.
पुण्य या दुष्पाप है
संघर्ष या अभिशाप है
आरक्षण की मार से
निष्पंद-स्वप्न हो रहा है.
मार-काट-क्रूरता
अनय की कठोरता      
क्रोध बन फूटता
कलह-बैर-दुष्टता
जातिगत-जड़ता
कलंक बनता जा रहा है.
    

Saturday, 24 March 2018

श्री राम वन्दनम्


दशरथ-तनय सीता-प्रणय
मद-मोह भव-भय नाशनम्
हे पद्म-नेत्रम्  मेघ वर्णम्
रोग-शोक विनाशनम्.
अमोघ कर धनु-सायकम्
तन पीत-वस्त्र सुशोभितम्
पुरुषोत्तमम् - सुलोचनम्
सद-आचरण दे मोक्ष मम्.
शांति-प्रिय करुणा-हिय धन्य
पुण्य सत्य विभावनम्
अच्युत-प्राण वैकुण्ठ-धाम
जय ज्ञान-वान पुरातनम्.
हे जनार्दन धरणी-धरण्
नारायणम् जय चराचरम्
ओज-तेज प्रकाश-वेग
जय वेद-विज्ञ सनातनम् .
दीन-बंधु दयालु-सिन्धु
जय सर्व-लोक परायनम्
नीरज-नयन शशि-सम बदन
इंदिरा-पति दे शुभ वरम्.
हे सर्व-दर्शी धर्म-अर्थी
श्रीनिधि कर मंगलम्
जय अनूप-रूप दुर्लभ-स्वरुप
वन्दे युगल-पद पंकजम्.

Wednesday, 7 March 2018

वार्षिक उत्सव आज मनाया



महीने भर का था परिश्रम
परिवेश सुखद बन आया
हर्ष-उल्लास-उमंग से भरकर
वार्षिक उत्सव आज मनाया.
न्योछावर था कण-कण में आशा
था अर्पण हिय की अभिलाषा
प्रति-पल प्रेम ह्रदय का छलका
नाच रही थी लहर-लहर में
इक आनंद की माया,
वार्षिक उत्सव आज मनाया.
अहंकार निज तज बैठे थे
स्नेह-मिलन में रंग बैठे थे
अभिनव पुलकित भाव उठे थे
इन बचपन के मृदु-गुंजन से
सीख अनूठी पाया,
वार्षिक उत्सव आज मनाया.
उन्मुक्त हँसी शोभित अधर
चंचल-कोमल रूप प्रखर
मीठे-मीठे मोहक सा स्वर
ख़ुशी में डूबा था ये अवसर
उर में अनुराग समाया,
वार्षिक उत्सव आज मनाया.          

Wednesday, 31 January 2018

वो बेटी है



जीवन में भरती नव-नव मोद
खेलती-कूदती करती विनोद
जो मनुहार में जीती है , वो बेटी है
जो रुद्ध कंठ से रोती है
झकझोर ह्रदय को करती है
जो पलकों पर सावन रखती है , वो बेटी है
पल-पल विकलित क्षण-क्षण विचलित
शिशु सौरभ सा स्मित पुलकित
जो शशि छूने को मचलती है , वो बेटी है
कोमल-कोमल अंग-राग
अरुण नयन में भरे अनुराग
जो दीपशिखा सी जलती है , वो बेटी है
सुख में दुःख में अंधकार में
वाणी से शोभित संस्कार में
जो प्रेम की धारा बहाती है , वो बेटी है