Thursday, 31 July 2025

नष्ट हुई एकता

 

नष्ट हुई एकता

दूरियांँ बढ़ने लगी 

अपेक्षाओं के भार से 

समस्याएँ गढ़ने लगी ।

विश्वास टूटने लगा 

कलह का आरंभ हुआ 

स्वजन के विरोध से

 मतभेद का नाद हुआ ।

स्नेह कहाँ खो गयी

दंभ का विकार हुआ

सुखमय सी स्मृतियाँ

संदेह का आधार हुआ ।

होगा नहीं मिठास अब

रिश्तों में दरार हुआ 

सत्य हारता गया 

वेदना अपार हुआ ।

अपनों का आदर नहीं 

खराब संस्कार हुआ 

क्षमा माँगते बड़े 

छोटे का व्यवहार हुआ ।

व्यथा विषाद कराह से 

क्लेश का संचार हुआ 

मौन रहें अब सर्वदा 

समाधान स्वीकार हुआ ।

भारती दास ✍️

14 comments:

  1. सत्य उकेरती अभिव्यक्ति।
    सादर।
    ------
    जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार १ अगस्त २०२५ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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  2. धन्यवाद श्वेता जी

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  3. मौन ही उत्तम समाधान है ... बहुत खूब ...

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  4. धन्यवाद सर

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  5. सुंदर सृजन, वर्तनी की त्रुटियाँ खल रही हैं

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  6. धन्यवाद अनीता जी
    किस जगह कृपया बतायें

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  7. आपकी कविता पढ़कर ऐसा लगा जैसे हमारे आस-पास जो रिश्तों में दरारें आ रही हैं, उन्हें किसी ने शब्दों में उतार दिया हो। एकता की नज़ाकत, विश्वास का टूटना, और स्नेह का खो जाना, सब कुछ इतनी सच्चाई से लिखा है। सबसे ज़्यादा असर तो वो पंक्तियाँ करती हैं जहाँ बड़े क्षमा माँगते हैं और छोटे उल्टा व्यवहार करते हैं। समाज की हकीकत है ये। रिश्तों में मिठास बनाए रखना अब सच में टेढ़ी खीर लगती है।

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  8. धन्यवाद सर

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