Wednesday, 31 December 2025

नवीन वर्ष शुभ आगमन हो

 नवीन वर्ष शुभ आगमन हो 
उमंग-मोद से भरे चरण हो....
सर्व प्रीति का मशाल लेकर 
आओ शक्ति का ढ़ाल बनकर
भयभीति का ना उन्नयन हो
नवीन वर्ष शुभ आगमन हो....
अतीत बीता है विनाश से 
उद्दंडता से घृणा-द्वेष से 
उदारता का नवल सृजन हो
नवीन वर्ष शुभ आगमन हो....
चेतना के प्रगाढ़ मनपर
साधना का स्वभाव बनकर 
शांति संयम का लक्ष्य चरम हो
नवीन वर्ष शुभ आगमन हो....
सुखद नीड़ में हर्ष मधुर हो 
हँसी-दुलार-अनुराग अधर हो
अन्याय-अनीति-विभेद दमन हो
नवीन वर्ष शुभ आगमन हो....
भारती दास ✍️ 



Wednesday, 24 December 2025

नियति-नीड़ में छिपा हुआ है

 

एक ठौर से दूजे ठौरों पर

मन पंछी बन उड़ता रहता है 

मलय पवन संग अनुभव लेकर 

कटु जाल बुनता रहता है।

अंधकार के नीरवता में 

एक दीपक जलता रहता है 

अनगिनत यादें अतीत की

साया बन छलता रहता है।

विकल नेत्र में आशायें जगती 

एक कोमल आलोक पसरता 

निद्रा सुंदर स्वप्न दिखाती

मधुर भाव तन-मन में भरता।

नियति-नीड़ में छिपा हुआ है 

कर्म किरण की पावनता 

अंतर्मन को रोशन करके

अस्तित्व का दर्पण दिखलाता।

जन्मदिन का अरूणिम प्रभात 

जाने क्या संदेश ले आये 

शायद तृप्त हृदय को करके 

अंजूरी में शुभ हर्ष दे जाये।

भारती दास ✍️ 



Tuesday, 9 December 2025

कण-कण में है मोद का दर्पण

 

तृण-तृण में सौन्दर्य सुहावन

कण-कण में है मोद का दर्पण 

क्षमा-दया है जीवन-दर्शन 

संस्कृति में है चिर अपनापन

उसी पुण्यमयी धरणी का

करते हैं आराधन,

जय मातृभूमि मनभावन....।

बेला-गुलाब-चंपा का हँसमुख

पुष्प चढ़ाते जिनके सम्मुख 

मोर-पपीहा-कोयल-बुलबुल 

गाते सुन्दर सरगम का सुर

भारत माता के चरणों में

प्रकृति करती अभिवादन,

जय मातृभूमि मनभावन....।

गर्मी तपाती वर्षा भींगाती

हेमंत-शिशिर की निशा कँपाती

शरद ऋतु का चंद्र सुहाता 

वसंत ऋतु मन को हर्षाता

रोम-रोम सुख दर्शित होता

हँसता वसुधा का प्राँगन,

जय मातृभूमि मनभावन....।

अन्न नीर से पोषित करती 

सुखद समीर साँसों में भरती 

गिरि शिखर से उतर-उतरकर 

चंचल निर्मल जल बह-बहकर 

झरना-ताल-नदी-सरोवर

बनकर बहता पावन,

जय मातृभूमि मनभावन....।

भारती दास ✍️ 

Monday, 24 November 2025

जहाँ धर्म है वहीं विजय है

थी धर्मपरायण पुण्यात्मा नारी

दुर्योधन-जननी माता गाँधारी

उनकी वचन मिथ्या नहीं जाती 

सच हो जाता जो वह कहती 

माँ के पास सुयोधन आता 

विजय प्राप्ति का आशीष माँगता

एक ही उत्तर वो प्रतिदिन देती

जहाँ धर्म की पूजा होती 

वहीं पर जय है वहीं विजय है 

वहाँ ना कोई छल और भय है 

जो धर्म की रक्षा करता है 

वही विजयी कहलाता है 

हठ विप्लव की वृष्टि करता 

विनाश कर्म की पुष्टि करता 

सुयोधन का आक्रोश देखकर

डरती थी मन में आठों पहर 

मौन चुप हो जाती गाँधारी

व्यथा भार सहती लाचारी 

उत्थान-पतन नियति करती है 

अवलंबन भी छीन लेती है

शक्ति पूँज मन सहा आघात 

चाहे उजड़ा सारा साम्राज्य 

समस्त पुत्रों का हो गया अंत

छोड़ ना पाई धर्म का पंथ

मातृवत प्रेम में भीगी दृष्टि 

थी वो प्रवित्र पावन सी मूर्ति 

पाँडव धर्म के साथ चले 

सतत् विजय उनको मिले।

भारती दास ✍️

Saturday, 8 November 2025

मुझे गर्व है मैं हूंँ बिहारी

 मुझे गर्व है मैं हूँ बिहारी 

माँ ब्राह्मी की मैं हूँ पुजारी ....

जिस मिट्टी में पली बढ़ी थी 

सेवा-त्याग-अनुराग भरी थी 

थी रामप्रिया वो सियादुलारी 

मुझे गर्व है मैं हूँ बिहारी....

मैथिल कोकिल थे विद्यापति 

किये असाध्य थे शंकर की भक्ति 

बने थे सेवक उनकी पुरारी

मुझे गर्व है मैं हूँ बिहारी....

ओजस्वी कवि दिनकर जी थे 

विद्रोही क्रांति के स्वर थे

राष्ट्रप्रेम थी उनकी प्यारी 

मुझे गर्व है मैं हूँ बिहारी....

वीर कुँवर सिंह थे स्वाभिमानी 

जख्मी भुजा काटे थे अपनी 

देशभक्ति उनकी थी न्यारी 

मुझे गर्व है मैं हूँ बिहारी....

बातों में आ जाती हूँ मैं 

धोखा भी खा जाती हूँ मैं 

मीठे वचन पर जाती हूँ मारी

मुझे गर्व है मैं हूँ बिहारी....

भारती दास ✍️

Saturday, 1 November 2025

हे दीनबंधु नरायणम्


सरोज नयनम् शेष शयनम्

घनाभ तन हे जनार्दन 

कर शंख चक्र सुशोभितम्

हे दीनबंधु नारायणम्।

जय पद्मनाभम् लक्ष्मीकांतम्

श्री हरि जय विश्वेम्भरम्

हे सत्यरूपम् शान्ताकारम्

गरूड़ासनम् जगदीश्वरम्।

जय चतुर्भुजाय सुधाप्रदाय

 हे वृंदाप्रियम् परमेश्वरम्

हे महाबलाय सुलोचनाय

जय प्राणदाय पुरातनम् ।

जय वामनाय त्रिपदाय

जय सर्वनाथम् मंगलायम्

हे गगन सदृश्यम् विराट पुरुषम्

श्री विभु जय सनातनम्।

हे अनंत रुपम् हे सुरेशम्

अरुणाधरम्  हे मनोहरम्

असुरमर्दनम्  जगत वंदनम्

नमामि सिन्धु सुता वरम् ।

भारती दास ✍️ 



Thursday, 30 October 2025

अध्यात्म से ही कर्म-जगत है

 

ऊषा अर्चन-संध्या वंदन

प्रतिदिन का है धर्म-आचरण 

ईश्वर की पूजा और आराधना 

आशपूर्ण आस्था की भावना 

आस्तिक करता है विश्वास 

धर्म-कर्म और स्वर्ग की खास।

लेकिन नास्तिक कहता है 

लोग समय को नष्ट करता है 

परलोक का कोई सुधार नहीं है 

स्वर्ग-नर्क का आधार नहीं है 

किसने देखा है मृत्यु के बाद 

लय-गति होता प्राण का वास

यह है सिर्फ संभावना मात्र 

नहीं पता है स्वर्ग की बात।

ईश्वर का अस्तित्व वैज्ञानिक 

नहीं किया है अभी प्रमाणित 

मिथ्या है या फिर अनिश्चित 

पूजा का नियम बनाता दैनिक 

पाठ सिखाता है यह नैतिक

अनुशासन से बाँधा है आस्तिक।

अध्यात्म से ही कर्म-जगत है 

भक्ति से ही भक्त सहज है

छल-प्रपंच ना करे कपट

ईश्वर की शक्ति रहे सतत्

यह केवल एक भ्रांति है 

मौत सभी को आती है।

भारती दास ✍️ 

Monday, 20 October 2025

हर्ष-खुशी हो गम या विषाद

हर्ष-खुशी हो गम या विषाद 

दीपक हरता है तम अवसाद

मौन निशा का गहन अँधेरा

जैसे निबल हो विकल मन हारा

धरणी करती है सम अनुराग 

दीपक हरता है तम अवसाद....

काली रजनी विचलित करती 

प्राणी सबको विकलित करती

दीपों की लड़ी करती जयनाद 

दीपक हरता है तम अवसाद....

कहीं झोंपड़ी कहीं अटारी

रोशन हो गई धरती सारी

गली-गली में खुशी है आज 

दीपक हरता है तम अवसाद....

भारती दास ✍️ 

Thursday, 16 October 2025

सीख नई समझाती नदियाँ

 

बड़े-बड़े पेड़ों का मूल

प्रवाह में अपनी बहाती नदियाँ

किन्तु बेंत का पतला वृक्ष 

नहीं बहा ले जाती नदियाँ।

कमजोर समझकर करती उपेक्षा 

या उपकार कर देती नदियाँ

कोई खास रहस्य है गहरा

सीख नई समझाती नदियाँ।

प्रतिकूल बर्ताव के कारण 

तरू बड़े बह जाते हैं 

बेंत नदी के वेग भाँपकर

अपना शीश झुकाते हैं।

समय के साथ जो बुद्धि दिखाता 

उसका विनाश नहीं होता है 

सदा अकड़कर रहने वाला 

वक्त की मार को खाता है।

विद्वान सदैव विनम्र ही रहते 

उपकार सहज कर देते हैं 

त्याग अति ना भोग अति हो

सत्य की मार्ग चुन लेते हैं।

युक्ति संगत बातें कहकर 

अर्थपूर्ण मुस्काती नदियाँ

सरिताओं के स्वामी सागर

मुग्ध हुए सुन गूढ़ नीतियाँ।

भारती दास ✍️

Thursday, 25 September 2025

मोह छोड़कर जाना होगा


नील गगन में घूम रही थी

तारों का मुख चूम रही थी 

फिर बादल ने आकर बोला 

नभ-प्राँगन में रहना होगा 

मोह छोड़ कर जाना होगा।

मैंने तो देखा था सपना 

अश्रु भरे थे सबके नयना

छूकर देखा अंगों को अपना

अभी साँस को बहना होगा 

मोह छोड़कर जाना होगा।

पूरे हुये अरमान बहुतेरे 

कुछ इच्छाएँ  रहे अधूरे

है अच्छे कर्मों का अर्जन

दुःख नहीं कुछ ,कहना होगा 

मोह छोड़कर जाना होगा।

स्नेहाशीष मैं दे जाऊँगी

प्रभु चरणों में जा बैठूँगी

और किसी से क्या कहूँगी

व्यथा असीम है सहना होगा

मोह छोड़कर जाना होगा।

भारती दास ✍️

मेरी पुण्यमयी सासू माँ गोलोक धाम

चली गई