तितली और मधुमक्खी दोनों
साथ में उपवन आती थी
पुष्प रस को पीने हेतु
आपस में ही झगड़ती थी।
पुष्प पराग को मैं पीयूँगी
तितली यूँ मुस्का कर बोली
मधुमक्खी ने कहा प्यार से
हठ ना कर उड़ जा ओ पगली।
है अधिकार मेरा ही पहले
तितली फिर इठला कर बोली
सुन्दरता के मद में उसने
करती रही केवल अठखेली।
एक डाल पर बैठा था तोता
दोनों को अपने पास बुलाया
अधिकार से पूर्व है काम जरूरी
कुछ नैतिक चीजें भी समझाया।
तितली के सम्मुख हो वह बोला
पुष्प रस को यूँ ही पीती हो
परोपकार का कार्य नहीं करती
अपने लिए ही तुम जीती हो।
रस एकत्र करती मधुमक्खी
मीठा शहद बनाती है
कुसुम पराग को बिखेरती रहती
बागों में पौध बढ़ाती है।
वह श्रम निरंतर करती रहती
समाज की सेवा करती है
समूह कार्य की प्रेरणा देकर
सहयोग-समर्पण सिखलाती है।
भारती दास ✍️
No comments:
Post a Comment