नष्ट हुई एकता
दूरियांँ बढ़ने लगी
अपेक्षाओं के भार से
समस्याएँ गढ़ने लगी ।
विश्वास टूटने लगा
कलह का आरंभ हुआ
स्वजन के विरोध से
मतभेद का नाद हुआ ।
स्नेह कहाँ खो गयी
दंभ का विकार हुआ
सुखमय सी स्मृतियाँ
संदेह का आधार हुआ ।
होगा नहीं मिठास अब
रिश्तों में दरार हुआ
सत्य हारता गया
वेदना अपार हुआ ।
अपनों का आदर नहीं
खराब संस्कार हुआ
क्षमा माँगते बड़े
छोटे का व्यवहार हुआ ।
व्यथा विषाद कराह से
क्लेश का संचार हुआ
मौन रहें अब सर्वदा
समाधान स्वीकार हुआ ।
भारती दास ✍️