मेरे पिताजी नहीं रहे
दुनिया छोड़ चले
गए
चिर-निद्रा में
होकर लीन
पंचतत्व में हुए
विलीन
उनकी याद बसी हर –कण
में
संस्कार देकर
जीवन में
उन्होंने ने जो
की उपकार
सुखद बना घर व
परिवार
पितर बने वो
पथ-प्रदर्शक
बने दयालु सदा
सहायक
संवेदनाओं की
गूंज बने
दया –स्नेह की
पुंज बने
सौहार्द –भावना
है अपार
हर –पल दे सुन्दर
विचार
भाव मन की जूड़ी
रहे
अनुकम्पा उनकी
बनी रहे
सच ही किसी ने
कहा- यहाँ है
जाने वाले मिले
कहाँ है
वापस कभी नहीं
आयेंगे
तारे बन कर मुस्कायेंगे
धन्यवाद सर
ReplyDeleteशब्दों में तुम्हारे पिताजी के लिए जो आदर, प्रेम और कृतज्ञता है, वह बहुत साफ महसूस होती है। ऐसा लगता है जैसे वे आज भी संस्कारों, विचारों और संवेदनाओं के रूप में तुम्हारे साथ चल रहे हों।
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