शीत ऋतु की अनुभूति भी
विकल ग्रीष्म का ताप प्रखर
प्राची की अरुणिम ऊषा सी
जीवन का अनमोल सफर।
नील व्योम की विशाल वक्ष सा
है अगाध विश्वास भरा मन
सहज सुभग अनुराग भरा
है साँसो का कोमल स्पंदन।
इकतीस वर्ष के पावन संग का
अनगिनत ही एहसास लिए
वही वसंत फिर से आया है
उमंग अनंत उत्साह लिए।
भारती दास ✍️
बहुत बहुत शुभकामनाएँ भारती जी!
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