एक त्यॊहार कई है नाम ,
भारत कीहै यही पहचान,
मकर-संक्राति,पोंगल,लॊहिडी़ ,
कहीं पर बनता स्वादिष्ट खिचड़ी,
तिल की मीठी लड्डू खाते,
उमंग से जीते और मुस्काते,
आसमान में पतंगे चढ़ती,
सपनों की उड़ानें भरती,
डोर की
जोर पर चढ़ती गयी,
होड़ ही होड़ में बढती गयी,
व्योम के सारे पक्षी तमाम,
जी सके है यही पैगाम,
दुबककर बैठी सारी चिड़ियाँ,
होड़ ही होड़ में बढती गयी,
व्योम के सारे पक्षी तमाम,
जी सके है यही पैगाम,
दुबककर बैठी सारी चिड़ियाँ,
देखकर दुनिया की ये खुशियाँ।
भारती दास ✍️
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