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Friday, 30 September 2016

कंठ-कंठ से उठा जयघोष



इस्लामी हमलों से आहत
जब-तब होता रहता भारत
सरहद पर बसने वाले लोग
आतंक के साये में जीते लोग
चिंतन करते रहते अभागे
शायद भाग्य कभी न जागे
बेरंग गुजरती उनकी शाम
बोझिल होती रातें तमाम
झूठ-फरेब मक्कारी के स्वर
नित-दिन निकलते रहते खंजर
अपनी उदासी में सब चुप थे
मन में उठती टीसें जो चुभते
लोग विकल थे कराह रहे थे
अनगिनत आहें भर रहे थे
शोक से आतुर पथ का आघात
शहीद हुए थे जो जज्बात
बर्दास्त के बाहर हुए हालात
रोती बिलखती इंसानी गात
सैनिकों के उत्साह से डरकर
बिखरे दुश्मन हुए निरुत्तर
कंठ-कंठ से उठा जयघोष
आनंद मना रहा भर जोश
निखर उठा है सुखमय प्रभात
जगदंब पधारी शुभ दिन आज.