गाँव-गाँव शहर शहर
मस्ती की धूम मचाता
जिस रंग से तन मन भीगा
वही होली फिर आ पहुँचा।
चिंतन के उस पावन रंग में
अपनी गरिमा भी आ सिमटा
विचारशील लोगों ने तो
होली को उन्माद ही समझा।
नैतिकता से बढ़कर कोई
और नहीं जग की सुन्दरता
अमर हो गए लोग वो सारे
जिन्होंने था इसको परखा।
अपनी ही जिद्द-हठ के कारण
जल मरी थी खुद होलिका
भक्त प्रहलाद तो श्रेष्ठ बने
जीती भक्ति उदारता।
सतरंगी इस दुनिया में
रंग-संग स्नेह बरसता
ये पावन त्योहार मनाएँ
रहे सदा भावों की क्षमता ।
भारती दास ✍️