स्मृति में शतरंग समाई
स्वर्ण प्रात फिर मुस्काई है
नवल नेह में बंधे थे आज
रमणी सी रजनी शरमाई है।
तीस बसंत आये जीवन में
अनगिनत बीती पतझाड़ें
हर्षाई है देख विभावरी
विधु चांदनी की मनुहारें।
अवनी की उन्मुक्त हंसी से
मगन गगन का मुग्ध नयन है
मनमोहक अरुणिम सी प्राची
सुंदर सुरभित मनभावन है।
मेरी आंखों की मृदु रातें
मूक मधुर ताने बुनती है
सजल कपाल को सहलाकर
निज अंकों में भर लेती है।
भारती दास ✍️
बहुत बहुत बधाई
ReplyDeleteधन्यवाद अनीता जी
Deleteतीस बसंत आये जीवन में
ReplyDeleteअनगिनत बीती पतझाड़ें
हर्षाई है देख विभावरी
विधु चांदनी की मनुहारें।
हार्दिक बधाई🌹🌹❤️🌹🌹
धन्यवाद सर
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