करुणामयी-ममतामयी
सेवामयी होती है माँ
आशामयी-श्रद्धामयी
शुभतामयी कहलाती
माँ ।
बलिदानी सा पथ
अपनाकर
खुशियाँ सदा
लुटाती माँ
वेदना की तापों में
जलकर
छाँव-आँचल की बन
जाती माँ ।
त्याग ही तो करती रहती
स्नेह सदा लुटाती माँ
आंच न आये सुत पर
उनकी
खुद चट्टान बन
जाती माँ ।
नन्ही सी मुस्कान
के खातिर
अपनी जान गंवाती माँ
हो संस्कारी उनके बच्चे
यही सोच
अपनाती माँ ।
खुद की कभी सुध
न लेती
सुख साधन बन जाती
माँ ।
जब सबल हो जाते
बच्चे
मूढ़ अनपढ़ बन जाती माँ
बरसों के सपने टूटने लगते
दर्द से आखें छलकाती
माँ ।
उम्र की एक पराव पर
आती तब हताश हो जाती
माँ
सारा जीवन बोझ ही
लगता
जब गैरों सा हो जाती माँ ।
भारती दास ✍️
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