गाँव-गाँव शहर शहर
मस्ती की धूम मचाता
जिस रंग से तन मन भीगा
वही होली फिर आ पहुँचा।
चिंतन के उस पावन रंग में
अपनी गरिमा भी आ सिमटा
विचारशील लोगों ने तो
होली को उन्माद ही समझा।
नैतिकता से बढ़कर कोई
और नहीं जग की सुन्दरता
अमर हो गए लोग वो सारे
जिन्होंने था इसको परखा।
अपनी ही जिद्द-हठ के कारण
जल मरी थी खुद होलिका
भक्त प्रहलाद तो श्रेष्ठ बने
जीती भक्ति उदारता।
सतरंगी इस दुनिया में
रंग-संग स्नेह बरसता
ये पावन त्योहार मनाएँ
रहे सदा भावों की क्षमता ।
भारती दास ✍️
आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर मंगलवार 3 मार्च 2026 को लिंक की गयी है....
ReplyDeletehttp://halchalwith5links.blogspot.in पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!
!
धन्यवाद सर 🙏🙏
Deleteहोली शुभ हो | सुंदर I
ReplyDeleteधन्यवाद सर 🙏🙏
Deleteशुभकामनाएँ
ReplyDeleteसुन्दर रचना
धन्यवाद सर 🙏🙏
ReplyDeleteThis comment has been removed by the author.
ReplyDeleteसुन्दर रचना
ReplyDeleteधन्यवाद सर 🙏🙏
Deleteहोली आ पहुँची और चली भी गई, शुभकामनाएँ
ReplyDeleteधन्यवाद अनीता जी 🙏🙏
Delete