जब तक थी वो घर के अंदर
दुनिया कोसती रहती अक्सर
आज दहलीज के पार है
करती सपने साकार है ।
जमीन अपनी तलाशती हुई
साहस का परिचय देती हुई
हर -क्षेत्र में महिला छाई आज
उनसे जाग्रत हुई समाज ।
पराबलंबन छोड़ चुकी है
तन और मन को जोड़ चुकी है
नारी है सुन्दरतम रचना
ना कोई क्षोभ ,ना कोई छलना।
जिस घर में नारी का पूजन
उस घर को प्रभु करते वंदन
अहं छोड़ कर उसे अपनाये
अपना घर जन्नत सा बनाये ।
भारती दास ✍️
महिला दिवस पर सुंदर सृजन
ReplyDeleteधन्यवाद अनीता जी
Deleteसुंदर काव्य सृजन
ReplyDeleteधन्यवाद सर
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