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Tuesday, 31 July 2018

हे मानव मत मानवता छोडो


अमावसी गगन में जैसे
अंजन सा दिखता अंधकार
दिशा का ज्ञान कराती वैसे
तारों का स्नेहिल उपकार.
एक मात्र आशायें भरकर
नेत्र देखता है संसार
धरा घुमती रहती हरपल
लेकर ढेरों भाव उदार.
मूंदें पलकें उर में झांकें
छिपा ह्रदय में अतिशय प्यार
कनक प्रभात से झरते जैसे
दिग-दिगंत का शुभ्र श्रृंगार.
दुर्बल धारणा चेतनता की
मन को उलझता हर बार
क्या है सुख ये कौन कहे
बढ़ता मूक संताप का भार.
मानव-दानव बनकर बैठा
प्राणों का करता व्यापार
मित्र-बंधु सब भूलकर ही तो
शत्रुपूर्ण करता व्यवहार.
महामुनि का श्रेष्ठ वचन
हो मानव, मानवता को जोड़ो
है अजेय बल-शक्ति तुम्हारी
ध्वस-विध्वंस द्रोह को छोडो.
गिरा कहाँ ये समझ न आया
दया-धर्म जाति-संस्कार
व्यर्थ अभिमान में जीते लोग
छोड़ जाते सुख मोह के द्वार.