Saturday, 22 December 2018

ये शीत रैन करते बेचैन

सूर्यदेव हो चले हैं अस्त
निज रश्मियों को लिए समेट
प्रभात का चिन्ह रहा न शेष
रातों ने अपनी सजायी सेज.
हुए दूर सघनता में विलीन
नभ की अनंतता है असीम
दिनकर की किरणें हुई है क्षीण
आभा हुई मुख की मलीन.
ये दिवस ढला दीपक जला
आलोक घर घर में भरा
द्वारों पर मौन गहरा रहा
गलियों में सन्नाटा बढ़ा.
रैन बसेरा बनकर बड़े
है अनगिनत तरुवर खड़े
आश्रय विहीन आकर ठहरे
है समीर सांझ की दुःखभरे.
ये शीत रैन करते बेचैन
हरते है चैन जगते है नैन
कंपित है तन विचलित है मन
दंडित हुआ जैसे चमन.
रजनी कुपित है भयावनी
बैठी है छुप के तरुवासिनी
कहती है घर की भामिनी
निष्ठुर बड़ी है यामिनी.

Sunday, 9 December 2018

शिशिर धूप जब आती है


ऊषा अपनी पंख पसारे
कोमल-कोमल कुसुम-कली पर
ओस की बूंदें लगते प्यारे.
निशीथ सबेरा है सुहावना
बिखरी धरा पर स्वर्ण-ज्योत्सना
पुलक भरी मादक भरी
ह्रदय में भरती स्नेह भावना.
निशा पराजित हो जाती है
होकर मौन वो सो जाती है
मंद-मंद हंसता है प्रभात
शिशिर धूप जब आती है.
सांय-सांय बहता है पवन
सिहर-सिहर उठता है बदन
रवि-किरण तन को छूती है
अनुरागी हो जाता है नयन.
नन्हें-नन्हें श्वान-पुत्र
कूं-कूं करता है नेत्र-मूंद
इन पशुओं का नहीं है गेह
स्नेहिल-ऊष्मा से पाता सुख.
नीरवता बन जाती सहेली
निर्ममता करती अठखेली
हंसता-गाता क्षण ये कहता
ये जीवन है एक पहेली.     
     

Wednesday, 24 October 2018

शरदचंद्र की सुहानी रात


शरदचंद्र की सुहानी रात
लगती प्यारी-मनोहारी आज ....
धवल-चन्द्रिका झूम रही है
हंसी अधर पर गूंज रही है
उजली-उजली ये नशीली रात
लगती प्यारी-मनोहारी आज ....
शुद्ध शीतल निष्पाप चाँदनी
शांत सुभग सौन्दर्य मोहिनी
लेती समेत कर्कश विषाद
लगती प्यारी-मनोहारी आज ....
स्निग्ध प्रेम की सौम्य सी धारा
हरती है व्याकुल सी पीड़ा
राधा-रमण की सुखभरी रात
लगती प्यारी-मनोहारी आज ....
धरा-गगन की मूक मनुहार
एक-दूजे को रहे निहार
ह्रदय से होती ह्रदय की बात
लगती प्यारी-मनोहारी आज ....
तृष्णा भरे थके नयन में
श्रम वेदना भूलते क्षण में
हर्षित मुदित है मन और गात
लगती प्यारी-मनोहारी आज    

Tuesday, 11 September 2018

शिव-पार्वती वंदन


शत-शत नमन अर्पित सुमन
शंकर-प्रिया मनमोहिनी
सुन्दर-वसन शोभित-बदन
पंकज-नयन सम्मोहिनी.
सुख-भाग्य दे सौभाग्य दे
अनुराग दे वरदायिनी
हिम-नंदिनी हर-संगिनी
वन्दे सकल शुभ दायिनी.
हे महेश-भामिनी सुखद-यामिनी
कैलाश-श्रृंग निवासिनी
भव-मोचिनी शिव-योगिनी
हे दक्ष-यज्ञ विनाशिनी.
पिनाकधारिणी हे भवानी
अनंत-रूप नारायणी
सर्व-विद्या शस्त्र-हस्ता
बलप्रदा ब्रह्म-रूपिणी.  
शैल-वनिता हरित-आलिका
हे गणेश-माता महातपा
मुनि वन्दिता जग-पालिका
नमामि पुरारी संग सदा.
सुहाग अटल हरपल रहे
दीजिये शुभ-आशीष
क्लेश-कष्ट हर लीजिये
नत मस्तक है शीश.

✍️भारती दास


Saturday, 25 August 2018

अभिनंदन है उर से वंदन


अभिनंदन है उर से वंदन
आया फिर से रक्षा बंधन....
करूण-नयन से नीर ना बहते
संग हमारे भाई होते
याद उन्हें करते हैं हर-क्षण
आया फिर से रक्षा बंधन....
था खुशियों से हँसता आँगन
एक-दूजे में था अपनापन
था अनुरागी प्यारा बचपन
आया फिर से रक्षाबंधन....
दूर रहे या पास में हो सब
दुआ अनेकों तुमसे है रब
हो दीर्घायु भाई का जीवन
आया फिर से रक्षाबंधन....        


Sunday, 19 August 2018

जग को छोड़ चले अटल

जग को छोड़ चले अटल
मन सबका करके विकल
उर का स्पंदन टूट गया
बंधन सारे छूट गया.
शोकाकुल है देश का घर-घर
रो उठा धरती और अंबर
वे थे ओजस्वी कवि प्रखर
जननायक वक्ता मुखर.
था पौरुष उनमें ओतप्रोत
बहता हृदय से नेह का स्त्रोत
तपस्वी सा सुन्दर व्यवहार
व्यक्तित्व था उनका सरल उदार.
सुनहली रातों की छाया
अंधकार की घन सी माया
मर्म वेदना जो था समाया
थककर सोया शिथिल सी काया.
नहीं हुआ कभी काल किसी का
पर कांपा होगा कर भी उसका
देश का कर्ज चुका गये
वो भारत पुत्र रूला गये.
जो रहे सदा ही सत्य चिरन्तन
नहीं किये कभी निर्मम क्रंदन
लडे़ अकेले जीवन का रण
नमन उन्हें  करता जड़ चेतन.
भारती दास

Wednesday, 15 August 2018

यह देश हमारा भारत वर्ष


ये देश हमारा भारत वर्ष
अद्भुत है इसका उत्कर्ष
उत्तर में है हिम का ताज
दक्षिण में सागर का राज
पूरब से आती है हर दिन
मनभावन सुखमय प्रभात 
है इसी भूमि पर अपना स्वर्ग
        यह देश हमारा भारत वर्ष.....     
सदियों से ही दुःख है झेले
मुगलों ,अंग्रेजों के झमेले
सबने इसको लूटा-मसला
पैरों से रौंदा और कुचला
सहती रही ये दर्द सहर्ष
यह देश हमारा भारत वर्ष....
बाजी लगाई प्राणों की अपने
एक से बढ़कर बलिदानी ने
भारत के दमन को बचाया
शीश कटा सम्मान दिलाया
घुट-घुट कर जीना है व्यर्थ
यह देश हमारा भारत वर्ष ....
दया धर्म से शोभित धरती
ऋषि मुनि सा देव विभूति
उदार मन और शांत प्रकृति
उन्माद भरा है द्वेष-दर्प
यह देश हमारा भारत वर्ष....
वीर भरत महाराणा  जैसे
सुभाष भगत सयाना जैसे
कोई वीर नहीं है शेष
जो धारण करले राम का वेश
छोड़ दिया करना संघर्ष
यह देश हमारा भारत वर्ष....
बापू की नीति याद नहीं है
दुःख नहीं फरियाद नहीं है
भारत पुत्रों को करके याद
आजादी दिवस मनाये आज
भरके मन में उद्गार हर्ष....
यह देश हमारा भारत वर्ष.    



Tuesday, 31 July 2018

हे मानव मत मानवता छोडो


अमावसी गगन में जैसे
अंजन सा दिखता अंधकार
दिशा का ज्ञान कराती वैसे
तारों का स्नेहिल उपकार.
एक मात्र आशायें भरकर
नेत्र देखता है संसार
धरा घुमती रहती हरपल
लेकर ढेरों भाव उदार.
मूंदें पलकें उर में झांकें
छिपा ह्रदय में अतिशय प्यार
कनक प्रभात से झरते जैसे
दिग-दिगंत का शुभ्र श्रृंगार.
दुर्बल धारणा चेतनता की
मन को उलझता हर बार
क्या है सुख ये कौन कहे
बढ़ता मूक संताप का भार.
मानव-दानव बनकर बैठा
प्राणों का करता व्यापार
मित्र-बंधु सब भूलकर ही तो
शत्रुपूर्ण करता व्यवहार.
महामुनि का श्रेष्ठ वचन
हो मानव, मानवता को जोड़ो
है अजेय बल-शक्ति तुम्हारी
ध्वस-विध्वंस द्रोह को छोडो.
गिरा कहाँ ये समझ न आया
दया-धर्म जाति-संस्कार
व्यर्थ अभिमान में जीते लोग
छोड़ जाते सुख मोह के द्वार.       
   

        

Saturday, 30 June 2018

आये कौन दिशा से सजल घन


आये कौन दिशा से सजल घन
बरसाये तुम जल-कण , आये....
दिशा-दिशा से घूम के आये
स्वजन नेह सन्देश सुनाये
छलक उठा है लोचन
बरसाये तुम जल-कण , आये ....
तृप्त हुए वसुधा के अंतर
उर के मयूरा नाचे मन-भर
पुलक उठा चित्त उपवन
बरसाये तुम जल-कण , आये ....
पगडंडी खेतों के सूखे
पलक बिछाये रास्ता देखे
हर्ष उठा है कण-कण
बरसाये तुम जल-कण , आये ....
उजले-उजले बूंदे गिरते
तड़ित मेह में लुक-छिप करते
उमंग भरा है तन-मन
बरसाये तुम जल-कण , आये....