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Monday, 13 November 2017

बच्चों से ही उज्जवल जग है



निर्मलता की निशानी बचपन
अल्हड़ता की कहानी बचपन
मुस्कान मधुर सुहानी बचपन
निष्कपट सी अज्ञानी बचपन.
बच्चो का होता कोमल मन
खुशियों से हँसता अंतर्मन
सरलता होती इमान-धरम
नहीं समझता पाप-पतन.
बाल-श्रमिक जीते शोषण में
मजबूर वे होते हैं जीवन में
भरके करुणा व्यथित नयन में
दर्द वे ढोते हैं जीवन में.
पूर्णतः ये बाते सच है
बचपन पर आई संकट है
उलझन में ही रहते सब है
भ्रमित वे होते भटकते पथ है.
प्यार मिले ,मिले प्रोत्साहन
हो सुन्दर पालन और पोषण
बच्चों में ही बसते रब हैं
बच्चों से ही उज्जवल जग है.