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Sunday, 10 September 2017

हो श्रद्धा न हो आडम्बर



थे श्रेष्ठ सदा ही पिता हमारे
कर्तव्य निभाकर गए वो सारे
मन की व्यथा भरा नहीं था
टूट-टूटकर उर बिखरा था
भाई भी जग को छोड़ गये
अनंत पीर में डूबो गये
चीत्कार ह्रदय कर रहा निरंतर
स्मृति-हीन हुये ना पलभर
नयन-नीर बह उठता अक्सर  
समय ने दी सांत्वना बढ़कर
उॠण नहीं होगा ये जीवन
महसूस उन्हें करते हैं कण-कण
है भक्ति-भाव भरा अंतर्मन
तन-मन सारा करता वंदन
हो श्रद्धा ना हो आडम्बर
पत्र-पुष्प सुमन-दल लेकर
पार्वण-श्राद्ध करता है जो नर
पितृ-आशीष पाता जीवन-भर.