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Sunday, 5 February 2017

शुष्क सुमन की इस दशा पर



जब था शैशव रूप सुमन का
पवन अंक में भर लेता था
मंजुल सुकोमल नवल गात पर
झूम झूम कर मुख छूता था.
मधुप-गण का मनुहार दुलार
मन को चंचल कर देता था
अंतर में आनंद बहाकर
दृग में नवीन खुमार भरता था.
चन्द्र की किरणें स्नेह लुटाकर
रजनी को लोरी सुनाती थी
सुन्दर छवि को देख-देख कर
पल-पल खुश हो मुस्काती थी.
लेकिन ये क्या हाय विधाता
बिखर गए मादक श्रृंगार
मोहक छवि का अंत हो गया
स्वार्थी बना वही संसार.
गंध में अब अनुराग नहीं है
चाह भ्रमर का बुझ सा गया है
चन्द्र किरण ना लोरी सुनाती
मुख-मंजू मुरझा सा गया है.
जिसको पवन लेकर अंकों में
प्यार किया था होकर लीन
जो सबके उर को भाया था
आज भूमि पर हुआ मलीन.
शुष्क सुमन की इस दशा पर
कभी नहीं कोई रोता है
अंत का ये कुदृष सदा ही
सबके जीवन में आता है.