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Monday, 25 July 2016

धीर-वीर तुम सैनिकों



विपत्तिग्रस्त ये देश हमारा  
करता सदा तुम्हे नमन है
हे धीर-वीर तुम सैनिकों
तुमसे ही तो आने वतन है.
भयभीत-डरावना सा बहुत ही
कल का वो पलछिन रहा़
आतंकी-उग्रवाद हमेशा
क्षण-क्षण करता छल रहा
गोली के उन बौछारों में
तुमसे ही तो जानें वतन है  
हे धीर-वीर तुम सैनिकों
तुमसे ही तो आने वतन है.
जब भी कोई संकट आता
तुम ही तो रक्षक बन जाते
प्राण-प्रण से जूझते रहते
जब तक धड़कन थम ना जाते
ना उर में भय ना पांव में बेड़ी
तुमसे ही तो शाने वतन है
हे धीर-वीर तुम सैनिकों
तुमसे ही तो आने वतन है.
अशक्त-वक्त की प्रवाह में
राजनीती बन गयी कुरीति
घृणा-द्वेष ने जड़ जमाया
रही ना अब वो पावन-प्रीति
जब शहीद हो जाते रण में
तुमसे ही सम्माने वतन है
हे धीर-वीर तुम सैनिकों
तुमसे ही तो आने वतन है.    


Monday, 18 July 2016

हे जगत गुरु दो सुन्दर सीख



करूं याचना मांगू भीख
हे जगत गुरु दो सुन्दर सीख
मंदिर मस्जिद और गुरूद्वारे
गिरजाघर हो या चौबारे
धर्मगुरु बोते विष बीज
हे जगतगुरु दो सुन्दर सीख....
एहसास अनेकों है अनुभूति
गुरु शिष्य की पावन प्रीति
तिमिर हटाओ बनकर दीप
हे जगतगुरु दो सुन्दर सीख....
दूर करो दुर्बलता मन की
संकल्प निभाये मानवता की
विश्व चमन में निखरे प्रीत
हे जगतगुरु दो सुन्दर सीख....
दुश्चिन्तन दुर्भाव मिटाओ
सद्चिन्तन को उर में बसाओ
करुण निवेदन सुन लो ईश
हे जगतगुरु दो सुन्दर सीख.....  

Thursday, 14 July 2016

हे मेघदूत तुम आये



हे मेघदूत तुम आये
सन्देश प्रीत का लाये
बरसा के नभ से सोना
दारिद्रय तुम मिटाये, हे....
प्यासी पड़ी थी धरती
मुश्किल में जान अटकी
जीवों में प्राण देकर
आनंद सुधा बहाये, हे....
कुसुमित हुई लतायें
हर्षित हुई फिजायें
मन बन गया है उपवन
उर में सुमन खिलाये, हे....
बिजली चमकती जाये
दादुर के सुर सुहाये
रिम झिम के स्वर निरंतर
नई कोई राग गाये, हे....      
                 

Friday, 1 July 2016

भावों की भव्यता



भावों की भव्यता में ही
काव्य की धारायें बहती 
सौन्दर्य की सुरम्यता में ही
रूपों के माधुर्य निखरती.
कविता एक प्रवाह है
भावों की अभिव्यक्ति है
मन के तार से झंकृत होकर
कथ्य कई कह देती है.
शब्द-निशब्द जब हो जाते हैं
भाव ह्रदय के बहते हैं
हर्ष-विषाद के अभिनव रूप
मधुमय गान बनाते हैं.
कभी हताशा कभी निराशा
जब भी शोर मचाते हैं
नैनों से मोती निकलकर
काव्य की माला पिरोते हैं.
किसी समय की सुखद स्मृति
अतुलनीय सुख पहुंचाते हैं
हरे भरे नव पल्लव सा मन
पुष्पित तरु बन जाते हैं.
भाषा की परिशुद्धता
कविता में नहीं होता
भावों का स्वर लय बन कर
छंद-बद्ध बन जाता.
है यही अभिलाषा मन की
सारी पीड़ा दुःख-सुख रख दूँ
भावनाओं का दीप जलाकर
परमात्मा के सम्मुख रख दूँ.