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Friday, 29 April 2016

सीखी न ढाई से आखर



फूलों से ये भरी बगीचा
सुहानी सी खुशियों का भोर
सुगंध भरी ये मस्त हवायें
पक्षियों के गीतों का शोर.
भांति-भांति के बना बहाने
बंध असत्य से जाता मन
नित नूतन इक गुलदस्ता सा  
प्राणों में भरता नव चेतन.
भाग्य बस छलती रही
मन भ्रमित होता रहा
नीरव-निशीथ का मौन-मंजू
सपने सजाता ही रहा.
धड़कनों  में बहती सांसे
रक्तों में भी प्रवाह रहा
कल्पनाओं के उन मंजर में
दर्द अनंत अथाह रहा.
निज मन का अस्तित्व नहीं
व्याकुलता करती है क्रंदन  
जो खोया है वो व्यर्थ नहीं
नीरस बन रहा है जीवन.
है विश्वास पाप पुण्यों में
सुख-दुःख का पल है मायावी
समय का पहिया घूमता रहता
कभी सहज कभी होता हावी.
पता नहीं क्यों सीख न पाई
जीवन में ढाई से आखर
निंदा को भूषण बनाकर
जीती हूँ मैं भी निशिवासर.     


               

Thursday, 21 April 2016

रामदूत तुम्हें कहाँ विश्राम



हे पवनपुत्र तुम बल के धाम
स्वीकार करो हनुमान प्रणाम , हे.....
ज्ञानियों में अग्र तुम्ही हो
सरल कृपालु नम्र तुम्ही हो
भक्त तुम्ही से है बलवान
स्वीकार करो हनुमान प्रणाम , हे......
जनक-सुता से आशीष लेकर
सौभाग्य बनाये सिंदूर मलकर
विशाल-लाल तन वज्र समान
स्वीकार करो हनुमान प्रणाम , हे......
राम-काज करने को तत्पर
सेवक-प्रिय तुम रहते हरपल
रामदूत तुम्हें कहाँ विश्राम
स्वीकार करो हनुमान प्रणाम , हे......
कलुष-क्लेश-संशय-विकार
मन के कष्ट मिटाओ अपार
तुमपर गर्व करते श्रीराम
स्वीकार करो हनुमान प्रणाम , हे .......         

Thursday, 14 April 2016

राम-नाम की महिमा व्यापक



शशि-मुख के जैसे वे सुन्दर
समुद्र के तल सम वे गंभीर
धैर्यवान पृथ्वी की भांति
आदर्शवान थे श्री रघुवीर.
माता-पिता-भाई-गुरुजन
सेवक-भृत्य या कोइ प्रजाजन
कर्तव्य पालन वो करते हरदम
शुचितामय था उनका जीवन.
विश्वामित्र के संग गये थे
तप-संयम-सेवा किये थे
शिरोधार्य हर कष्ट किये थे
असुर हीन जग को किये थे.
राम-नाम की महिमा व्यापक
कह गये भक्त कवि आराधक
गुणों की खान थे श्री भगवान
प्रजापालक पुरुषोतम श्री राम.
जग ढूंढ़ता है जिनको बाहर
वो बैठे हैं मन के अन्दर
सम आदर-सेवा-अपनापन
गुण जो समाये धैर्य-अनुशासन.        
     

Thursday, 7 April 2016

तुम ही हो माँ सत्य स्वरूपा



तुम ही स्वाहा तुम ही स्वधा
तुम ही हो माँ सत्य स्वरूपा ,तुम ही .....
तुम ही जीवन की सुधा हो
तुम ही अक्षर की मात्रा हो
सृष्टि तुम्ही से है जगदम्बा
तुम ही हो माँ सत्य स्वरुपा , तुम ही .....
तुम ही ब्रम्हा की स्तुति
तुम ही हो दीनों की शक्ति
तुम ही करती सबसे रक्षा
तुम ही हो माँ सत्य स्वरूपा , तुम ही .....
तुम ही मोह हो तुम ही माया
कण-कण में तुम ही महामाया
समस्त भाव तुमसे ही माता
तुम ही हो माँ सत्य स्वरूपा , तुम ही .....
तुम ही मंत्र हो तुम ही यन्त्र हो
अनंत गूढतम तंत्र में तुम हो
पूजा-अर्चन-ध्यान न आता
तुम ही हो माँ सत्य स्वरूपा , तुम ही.....