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Saturday, 10 December 2016

क्षेत्रे क्षेत्रे कर्म कुरु



प्रकृति ने हर जीव को
कर्म क्षेत्र से बांधा है
नियति ने भी कर्म को
धर्म से जोड़ा नाता है.
शिक्षक को अपने शिक्षण से
अज्ञान का तम मिटाना है
उज्ज्वल भविष्य के लिए
ज्ञान की रश्मि फैलाना है.
सैनिक जैसे संरक्षण में
सीमा पर भी मुस्काते हैं
जब-तक सांसे बुझ न जाती
प्राण-प्रदीप जलाते हैं.
धर्म-पुरोहित को जहाँ से
अंध-विश्वास भगाना है
आडम्बर के कांटे चुनकर
मन को स्वच्छ बनाना है.
हर नारी को प्यार से
इक परिवार बसाना है
संवेदन का सुमन खिलाकर
प्रेमालय को सजाना है.
अपने-अपने कर्मभूमि को 
धर्म का क्षेत्र बनाना है.
सद्भावों और सद्चिन्तन से
प्रेरणा बनकर मुस्काना है.
कर्म ही धर्म है इसे मानकर
क्षेत्रे-क्षेत्रे कर्म कुरु
गीता का सन्देश यही है
करे सदा शुभ कर्म शुरू.