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Friday, 29 April 2016

सीखी न ढाई से आखर



फूलों से ये भरी बगीचा
सुहानी सी खुशियों का भोर
सुगंध भरी ये मस्त हवायें
पक्षियों के गीतों का शोर.
भांति-भांति के बना बहाने
बंध असत्य से जाता मन
नित नूतन इक गुलदस्ता सा  
प्राणों में भरता नव चेतन.
भाग्य बस छलती रही
मन भ्रमित होता रहा
नीरव-निशीथ का मौन-मंजू
सपने सजाता ही रहा.
धड़कनों  में बहती सांसे
रक्तों में भी प्रवाह रहा
कल्पनाओं के उन मंजर में
दर्द अनंत अथाह रहा.
निज मन का अस्तित्व नहीं
व्याकुलता करती है क्रंदन  
जो खोया है वो व्यर्थ नहीं
नीरस बन रहा है जीवन.
है विश्वास पाप पुण्यों में
सुख-दुःख का पल है मायावी
समय का पहिया घूमता रहता
कभी सहज कभी होता हावी.
पता नहीं क्यों सीख न पाई
जीवन में ढाई से आखर
निंदा को भूषण बनाकर
जीती हूँ मैं भी निशिवासर.